महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७८

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७८

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 178वें (अंतिम) अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 6 (बकासुर का वध, बक के भाई और अन्य राक्षसों का शरण में आना)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच।1-178-1x ततः स भग्नपार्श्वाङ्गो नदित्वा भैरवं रवम्। शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद्बकः।।1-178-1a 1-178-1b तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः। निष्पपात गृहाद्राजन्सहैव परिचारिभिः।।1-178-2a 1-178-2b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर पसलियों और अंगों के टूटने के कारण भयानक चीत्कार करके, पर्वतराज के समान विशालकाय बक राक्षस प्राणहीन (मृत) हो गया। हे राजन्! उस राक्षस की मृत्यु के समय की उस भयानक ध्वनि से भयभीत होकर उसके परिवार के लोग और परिचारक (नौकर) अपने घरों से बाहर निकल पड़े।
  • व्याख्या: भीम द्वारा रीढ़ की हड्डी तोड़ दिए जाने के कारण बकासुर ढेर हो गया और उसकी अंतिम चीख से उसके साथी राक्षस डरकर बाहर आ गए।

श्लोक 3, 4 और 5:

`बकानुजस्तदा राजन्भीमं शरणमेयिवान्। ततस्तु निहतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं महाबलम्। राक्षसाः परमत्रस्ता भीमं शरणमाययुः।।'1-178-3a 1-178-3b 1-178-3c तन्भीतान्विगतज्ञानान्भीमः प्रहरतां वरः। सांत्वयामास बलवान्समये च न्यवेशयत्।।1-178-4a 1-178-4b न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित्। हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति।।1-178-5a 1-178-5b

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! तब बक का छोटा भाई और अन्य सभी महाबली राक्षस उस महाबली राक्षस (बक) को मरा हुआ देखकर अत्यंत भयभीत हो गए और भीम की शरण में आ गए। प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ, बलवान भीम ने उन डरे हुए और सुधि-बुधि खो चुके राक्षसों को सांत्वना दी और उन्हें एक नियम (समय) में बाँध दिया। भीम ने कहा— "अब से तुम लोगों द्वारा कभी भी मनुष्यों की हिंसा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि हिंसा करने वालों का वध इसी प्रकार शीघ्र ही हो जाता है।"
  • व्याख्या: बकासुर के मारे जाने के बाद बाकी राक्षसों ने भीम के आगे आत्मसमर्पण कर दिया, और भीम ने उन्हें चेतावनी दी कि वे भविष्य में कभी इंसानों को न सताएँ।

श्लोक 6 और 7:

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत। एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम्।।1-178-6a 1-178-6b `सगणस्तु बकभ्राता प्राणमत्पाण्डवं तदा।' ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत। नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः।।1-178-7a 1-178-7b 1-178-7c

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत! भीम के वे वचन सुनकर उन राक्षसों ने 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार किया और उस नियम को ग्रहण कर लिया। (तब बक के भाई ने अपने समूह सहित पाण्डव भीम को प्रणाम किया)। हे भारत! तब से लेकर वहाँ के वे राक्षस अत्यंत सौम्य (शांत) स्वभाव वाले बन गए और नगरवासियों को नगर में सामान्य रूप से दिखाई देने लगे।
  • व्याख्या: भीम के भय और उपदेश से राक्षस सुधर गए और उन्होंने इंसानों को परेशान करना हमेशा के लिए छोड़ दिया।

श्लोक 8 से 12 (भीम द्वारा बकासुर के शव को नगर द्वार पर ले जाना और ब्राह्मण के घर लौटना)

श्लोक 8 और 9:

ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम्। `निष्कर्णनेत्रं निर्जिह्वं निःसंज्ञं कण्ठपीडनात्। कुर्वन्बहुविधां चेष्टां पुरद्वारमकर्षत।।1-178-8a 1-178-8b 1-178-8c द्वारदेशे विनिक्षिप्य पुरमागात्स मारुतिः। स एव राक्षसो नूनं पुनरायाति नः पुरीम्।।1-178-9a 1-178-9b

  • हिन्दी अनुवाद: इसके बाद पवनपुत्र भीम ने उस प्राणहीन नर-भक्षी राक्षस (जिसके कान, आँख और जीभ नष्ट हो चुके थे तथा कण्ठ दबाने से जो अचेत था) को खींचकर नगर के द्वार तक घसीटते हुए पहुँचाया। द्वार देश पर उसके शव को फेंककर वे मारुति (वायुपुत्र भीम) अपने पुर (ब्राह्मण के घर) वापस लौट आए। (नगरवासियों ने सोचा कि) "यह वही राक्षस है जो निश्चित रूप से फिर से हमारी नगरी में आ गया है!"
  • व्याख्या: यह दिखाने के लिए कि राक्षस मारा जा चुका है, भीम ने उसके विशाल शव को घसीटकर एकचक्र नगर के मुख्य द्वार पर लाकर पटक दिया।

श्लोक 10, 11 और 12:

सबालवृद्धाः पुरुषा इति भीताः प्रदुद्रुवुः। ततो भीमो बकं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत्।।1-178-10a 1-178-10b बलीवर्दौ च शकटं ब्राह्मणाय न्यवेदयत्। तूष्णीमन्तर्गृहं गच्छेत्यभिधाय द्विजोत्तमम्।।1-178-11a 1-178-11b मातृभ्रातृसमक्षं च गत्वा शयनमेव च। आचचक्षेऽथ तत्सर्वं रात्रौ युद्धमभूद्यथा।।1-178-12a 1-178-12b

  • हिन्दी अनुवाद: बच्चे और बूढ़े सभी पुरुष यह सोचकर भय के मारे इधर-उधर भागने लगे। तदनंतर बकासुर का वध करके भीम वापस उस ब्राह्मण के घर गए और दोनों बैलों तथा उस शकट (गाड़ी) को उस ब्राह्मण को वापस सौंप दिया। उन्होंने द्विजोत्तम (ब्राह्मण) से कहा कि वे चुपचाप अपने घर के अंदर चले जाएँ। इसके बाद माता और भाइयों के पास जाकर अपने शयनकक्ष में उन्होंने रात में हुए उस युद्ध का पूरा हाल विस्तार से कह सुनाया।
  • व्याख्या: भीम ने अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए ब्राह्मण की गाड़ी और बैल सुरक्षित लौटा दिए और चुपचाप अपने कमरे में आकर रात की रोमांचक घटना सबको बता दी।

श्लोक 13 से 18 (नगरवासियों का आश्चर्य, बकासुर का शव देखना और ब्राह्मण का रहस्यमयी बयान)

श्लोक 13, 14 और 15:

ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात्कल्यमेव तु। ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम्।।1-178-13a 1-178-13b तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम्। दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः।।1-178-14a 1-178-14b एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे। ततः सहस्रशो राजन्नरा नगरवासिनः।।1-178-15a 1-178-15b

  • हिन्दी अनुवाद: इसके बाद प्रातःकाल ही (कल्यमेव) जब नगर के लोग बाहर निकले, तो उन्होंने उस राक्षस को भूमि पर खून से लथपथ मरा हुआ देखा। पर्वत के शिखर के समान विशाल और भयानक रूप में बिखरे हुए उस राक्षस को देखकर नगरवासियों के रोंगटे खड़े हो गए और वे अत्यंत हर्षित हुए। उन्होंने एकचक्र नगर में जाकर इस समाचार की पूरी जानकारी दी। हे राजन्! तब हजारों की संख्या में नगरवासी...

श्लोक 16, 17 और 18:

तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः। ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वाऽतिमानुषम्। दैवतान्यर्चयाञ्चक्रुः प्रार्थितानि पुरा भयात्।।1-178-16a 1-178-16b 1-178-16c ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने। ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते।।1-178-17a 1-178-17b एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान्। उवाच नागरान्सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा।।1-178-18a 1-178-18b

  • हिन्दी अनुवाद: ...स्त्रियों, वृद्धों और बालकों के साथ उस बक को देखने के लिए वहाँ आ पहुँचे। उस अतिमानुष (अलौकिक) कर्म को देखकर वे सभी विस्मित हो गए और उन्होंने भय के कारण पहले जिन देवताओं की प्रार्थना की थी, उनकी पूजा-अर्चना करने लगे। इसके बाद उन्होंने हिसाब लगाया कि आज भोजन भेजने की किसकी बारी (वार) थी। यह जानकर वे सभी लोग उस ब्राह्मण के पास आए और उससे पूछने लगे। पाण्डवों की रक्षा (गोपनीयता) का ध्यान रखते हुए उस ब्राह्मण श्रेष्ठ ने बार-बार पूछे जाने पर नगरवासियों से यह बात कही—
  • व्याख्या: नगर के लोग यह देखकर हैरान थे कि बकासुर जैसी बला टल कैसे गई। जब उन्होंने उस ब्राह्मण से पूछा जिसकी बारी थी, तो ब्राह्मण ने पांडवों की पहचान छिपाते हुए एक रहस्यमयी बात कही।

श्लोक 19 से 28 (ब्राह्मण का वक्तव्य, नगरवासियों का पांडवों के प्रति सम्मान और पुनः पठन-पाठन)

श्लोक 19, 20 और 21:

ब्राह्मण उवाच।1-178-19x आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः। ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः।।1-178-19a 1-178-19b परिप्रच्छ्य स मां पूर्वं परिक्लेशं पुरस्य च। अब्रवीद्ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव।।1-178-20a 1-178-20b प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद्दुरात्मने। मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत्।।1-178-21a 1-178-21b

  • हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मण बोला— "जब मैं अपने बन्धुओं के साथ भोजन (बलि) को लेकर रो रहा था, तब एक मंत्रसिद्ध और महामना ब्राह्मण (वहाँ) आए। इस नगर के कष्ट और मेरे क्लेश के बारे में मुझसे पूरी पूछताछ करके, उन ब्राह्मण श्रेष्ठ ने मुस्कुराते हुए मुझे विश्वास दिलाया और कहा— 'इसलिए मैं ही इस अन्न को उस दुरात्मा के पास पहुँचा दूँगा, और मेरे निमित्त तुम्हें कोई भय नहीं करना चाहिए।'..."
  • व्याख्या: ब्राह्मण ने नगरवासियों को बताया कि एक महान मंत्रसिद्ध ब्राह्मण ने उसकी सहायता के लिए खुद भोजन ले जाकर राक्षस को मारा है।

श्लोक 22, 23 और 24:

स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति। तेन नूनं भवेदेतत्कर्म लोकहितं कृतम्।।1-178-22a 1-178-22b ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः। वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा।।1-178-23a 1-178-23b ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति। तमद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन्।।1-178-24a 1-178-24b

  • हिन्दी अनुवाद: "...वे ही उस अन्न को लेकर बक के वन की ओर गए थे। निश्चित ही उन्हीं के द्वारा यह लोक-हितकारी कर्म किया गया है।" तब वे सभी ब्राह्मण, क्षत्रिया, वैश्य और शूद्र— सब लोग अत्यंत प्रसन्न और विस्मित होकर एक बड़ा उत्सव (ब्रह्ममह) मनाने लगे। इसके बाद जनपद के सभी लोग उस अत्यंत अद्भुत दृश्य को देखने के लिए नगर की ओर आए, जबकि पाण्डव वहीं (ब्राह्मण के घर में ही) रहे।
  • व्याख्या: पूरे नगर में उत्सव का माहौल बन गया, सभी लोग उस अज्ञात महापुरुष की प्रशंसा करने लगे, और पांडव अपनी पहचान छिपाए हुए वहीं निवास करते रहे।

श्लोक 25, 26, 27 और 28:

वेत्रकीयगृहे सर्वे परिवार्य वृकोदरम्। विस्मयादभ्यगच्छन्त भीमं भीमपराक्रमम्।।1-178-25a 1-178-25b न वै न संभवेत्सर्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु। इति सत्कृत्य तं पौराः परिवव्रुः समन्ततः।।1-178-26a 1-178-26b अयं त्राता हि खेदानां पितेव परमार्थतः। अस्य शुश्रूषवः पादौ परिचर्य उपास्महे।।1-178-27a 1-178-27b पशुमद्दधिमनच्चास्य वारं भक्तमुपाहरन्। तस्मिन्हते ते पुरुषा भीताः समनुबोधनाः।।1-178-28a 1-178-28b

  • हिन्दी अनुवाद: वेत्रकी (एकचक्र) के घरों में सभी लोगों ने भीमपराक्रमी वृकोदर भीम को चारों तरफ से घेर लिया और विस्मय के साथ उनके पास जाने लगे। नगरवासियों ने यह मानकर कि "महात्मा ब्राह्मणों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है," उनका सब प्रकार से सत्कार किया और उन्हें घेर लिया। लोगों ने कहा— "यह (ब्राह्मण रूपी महापुरुष) वास्तव में हमारे दुखों के असली रक्षक और पिता के समान हैं। हम सेवा की इच्छा से इनके चरणों की सेवा करेंगे।" उस राक्षस के मारे जाने पर वे सभी लोग भयमुक्त होकर अपने-अपने कार्यों में लग गए।
  • व्याख्या: नगरवासी उन ब्राह्मणों (पांडवों) के प्रति अत्यधिक आदर भाव रखने लगे और उन्हें अपना रक्षक मानने लगे।

श्लोक 29, 30 और अध्याय का समापन

श्लोक 29, 30 (क, ख, ग):

ततः संप्राद्रवन्पार्थाः सह मात्रा परन्तपाः। आगच्छन्नेकचक्रां ते गाण्डवाः संशितव्रताः।। वेदिकाध्ययने युक्ता जटिला ब्रह्मचारिणः। अवसंस्ते च तत्रापि ब्राह्मणस्य निवेशने। मात्रर सहैकचक्रायां दीर्घकालं सहोषिताः।।1-178-29a 1-178-29b 1-178-30a 1-178-30b 1-178-30c

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर कठोर व्रत का पालन करने वाले, परंतप पाण्डव माता कुन्ती के साथ एकचक्र नगर में ही रहे। वे वेदों के अध्ययन में लगे हुए, जटाधारी ब्रह्मचारी के रूप में उसी ब्राह्मण के निवास-स्थान पर माता के साथ लंबे समय तक सुखपूर्वक निवास करते रहे।
  • व्याख्या: बकासुर के वध के बाद भी पांडव अपनी पहचान गुप्त रखते हुए एकचक्र नगर में उसी ब्राह्मण के घर में ब्रह्मचर्य और अध्ययन का जीवन बिताते रहे। इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व पूर्ण होता है।
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