महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 182वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 9 (लाक्षागृह की घटना और पाण्डवों के विनाश का समाचार)
श्लोक 1, 2 और 3:
ब्राह्मण उवाच।1-182-1x श्रुत्वा जतुगृहे वृत्तं ब्राह्मणाः संशितव्रताः। पाञ्चालराजं द्रुपदमिदं वचनमब्रुवन्।।1-182-1a 1-182-1b धार्तराष्ट्राः सहामात्या मन्त्रयित्वा परस्परम्। पाण्डवानां विनाशाय मतिं चक्रुः सुदुष्कराम्।।1-182-2a 1-182-2b दुर्योधनेन प्रहितः पुरोचन इति श्रुतः। वारणावतमासाद्य कृत्वा जतुगृहं महत्।।1-182-3a 1-182-3b
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने कथा आगे बढ़ाते हुए कहा— लाक्षागृह की घटना को सुनकर संशितव्रती (कठोर व्रती) ब्राह्मणों ने पाँचालराज द्रुपद से यह वचन कहा— "धार्तराष्ट्रों (कौरवों) ने अपने मंत्रियों के साथ आपस में मंत्रणा करके पाण्डवों के विनाश का एक अत्यंत दुष्कर षड्यंत्र रचा। दुर्योधन द्वारा भेजा गया पुरोचन नामक व्यक्ति वारणावत में गया और वहाँ उसने एक विशाल लाक्षागृह (लाख का घर) बनवाया।"
- व्याख्या: अतिथि ब्राह्मण द्रुपद को विस्तार से बताता है कि कैसे कौरवों ने वारणावत में लाक्षागृह बनवाकर पाण्डवों को मारने की कुत्सित योजना बनाई थी।
श्लोक 4, 5, 6 और 7:
तस्मिन्गृहे सुविस्रब्धान्पाण्डवान्पृथया सह। अर्धरात्रे महाराज दग्धवानतिदुर्मतिः।।1-182-4a 1-182-4b तेनाग्निना स्वयं चापि दग्धः क्षुद्रो नृशंसवत्। एतच्छ्रुत्वा सुसंहृष्टो धृतराष्ट्रः सबान्धवः।।1-182-5a 1-182-5b अल्पशोकः प्रहृष्टात्मा शशास विदुरं तदा। पाण्डवानां महाप्राज्ञ कुरु पिण्डोदकक्रियाम्।।1-182-6a 1-182-6b अहो विधिवशादेव गतास्ते यमसादनम्। इत्युक्त्वा प्रारदत्तत्र धृतराष्ट्रः सबान्धवः।।1-182-7a 1-182-7b
- हिन्दी अनुवाद: "हे महाराज! उस अतिदुर्मति (पुरोचन) ने माता कुन्ती के साथ उस घर में पूर्णतः निश्चिंत सोए हुए पाण्डवों को आधी रात के समय जला दिया। उस अग्नि में वह क्रूर और नीच पुरोचन स्वयं भी नृशंस की तरह जलकर मर गया। इस समाचार को सुनकर सान्त्वना और सम्बन्धियों के साथ धृतराष्ट्र अत्यंत प्रसन्न हुए। उनका शोक बहुत कम हो गया और प्रहृष्ट चित्त होकर उन्होंने तब विदुर से कहा— 'हे महाप्राज्ञ विदुर! पाण्डवों की पिण्डोदक (श्राद्ध) क्रिया संपन्न कराओ। अहो! विधिवश ही वे यमलोक को चले गए।' ऐसा कहकर धृतराष्ट्र अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ वहाँ रोने लगे (दिखावे का विलाप किया)।"
- व्याख्या: कौरवों ने पाण्डवों को मारने के बाद दिखावे का शोक मनाया और विदुरजी को पाण्डवों के श्राद्ध-तर्पण की विधियाँ पूरी करने का आदेश दिया।
श्लोक 8 और 9:
श्रुत्वा भीष्मेण विदुरः कृतवानौर्ध्वदेहिकम्। पाण्डवानां विनाशाय कृतं कर्म दुरात्मना।।1-182-8a 1-182-8b एतत्कार्यस्य कर्ता तु न दृष्टो न श्रुतः पुरा। एतद्वृत्तं महाभाग पाण्डवान्प्रति नः श्रुतम्।।1-182-9a 1-182-9b
- हिन्दी अनुवाद: "भीष्मजी की आज्ञा सुनकर विदुरजी ने पाण्डवों का और्ध्वदेहिक (दाह-संस्कार व अंतिम संस्कार संबंधी) कर्म संपन्न कराया। पाण्डवों के विनाश के लिए उस दुरात्मा (दुर्योधन) द्वारा ऐसा घोर कर्म किया गया था। इस प्रकार का कार्य न तो पहले कभी देखा गया और न सुना गया था। हे महाभाग! पाण्डवों के संबंध में यह सारा वृत्तांत हमने इस प्रकार सुना है।"
- व्याख्या: विदुरजी और भीष्मजी ने लोक-मर्यादा के अनुसार पाण्डवों का अंतिम संस्कार संपन्न कराया, क्योंकि वे सच नहीं जानते थे कि पाण्डव बच निकले हैं।
श्लोक 10 से 18 (राजा द्रुपद का शोक और द्रौपदी को लेकर चिंता)
श्लोक 10, 11 और 12:
ब्राह्मण उवाच।1-182-10x श्रुत्वा तु वचनं तेषां यज्ञसेनो महामतिः। यथा तज्जनकः शोचेदौरसस्य विनाशे।।1-182-10a 1-182-10b तथाऽतप्यत वै राजा पाण्डवानां विनाशने। समाहूय प्रकृतयः सहिताः सर्वनागरैः।।1-182-11a 1-182-11b कारुण्यादेव पाञ्चालः प्रोवाचेदं वचस्तदा।।1-182-12a
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने आगे कहा— उन ब्राह्मणों के इस वचन को सुनकर महामति यज्ञसेन (द्रुपद) को ऐसा तीव्र दुःख हुआ, जैसे कोई पिता अपनी औरस (सच्ची) संतान के विनाश पर शोक करता है। पाण्डवों के विनाश का समाचार पाकर राजा द्रुपद वैसे ही संतप्त हुए। तब उन्होंने समस्त नागरिकों और मंत्रियों (प्रकृतियों) को एकसाथ बुलाकर, करुणा से विह्वल होकर पाँचालराज ने यह वचन कहा—
- व्याख्या: पाण्डवों की मृत्यु का समाचार सुनकर राजा द्रुपद को अपनी खुद की संतान के मारे जाने जितना ही भारी दुःख हुआ, और उन्होंने अपनी सभा बुलाई।
श्लोक 13, 14 और 15:
द्रुपद उवाच।1-182-12x अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यमहो बलम्।। चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवाः। भ्रातृभिः सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने।।1-182-13a 1-182-13b किमाश्चर्यमितो लोके कालो Hि दुरतिक्रमः। मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं करिष्यामि सांप्रतं।।1-182-14a 1-182-14b अन्तर्गतेन दुःखेन दह्यमानो दिवानिशम्। याजोपयाजौ सत्कृत्य याचितौ तौ मयाऽनघौ।।1-182-15a 1-182-15b
- हिन्दी अनुवाद: द्रुपद बोले— "अहो! उनका रूप, उनका धैर्य, उनका वीर्य और उनका बल! हे बन्धुओं! मैं रात-दिन केवल अर्जुन के बारे में ही सोचता रहता हूँ, जो अपनी माता और भाइयों के साथ उस आग में जल गए। इस संसार में इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा कि काल (समय) वास्तव में अति दुरतिक्रम (अलंघनीय) है। अब तो संसार में मेरी प्रतिज्ञा भी झूठी हो गई (क्योंकि मैंने अर्जुन के लिए ही यज्ञ किया था), ऐसी स्थिति में अब मैं इस समय क्या करूँ? अपने भीतर छिपे इस महान दुःख से मैं रात-दिन जल रहा हूँ। इसी कारण मैंने आदरपूर्वक उन अनघ (पापरहित) याज और उपयाज ऋषियों का सत्कार करके उन्हें आमंत्रित किया था..."
- व्याख्या: द्रुपद विशेष रूप से अर्जुन के लिए शोक मनाते हैं, क्योंकि उन्होंने यज्ञ अर्जुन को ही अपनी पुत्री (द्रौपदी) का पति बनाने के लिए कराया था, और अब अर्जुन के जलकर मरने की खबर से उनकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं।
श्लोक 16, 17 और 18:
भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै। लोकस्तद्वेद यच्चापि तथा याजेन मे श्रुतम्।।1-182-16a 1-182-16b याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादिताविमौ। धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ।।1-182-17a 1-182-17b किं करिष्यामि ते नष्टाः पाण्डवाः पृथया सह।1-182-18a
- हिन्दी अनुवाद: "...कि जो भारद्वाज (द्रोण) के वध करने वाले हों और जो देवी (द्रौपदी) अर्जुन की पत्नी बने— जैसा कि पूरा संसार जानता है और मैंने याज ऋषि से भी सुना था। याज ने पुत्र की कामना वाले मेरे लिए हवन करके इन दोनों (धृष्टद्युम्न और कृष्णा) को उत्पन्न किया था, जो दोनों मेरे संतोष को बढ़ाने वाले हैं। किंतु अब मैं क्या करूँ? कुन्ती के साथ वे पाण्डव तो (लाक्षागृह में) नष्ट हो चुके हैं!"
- व्याख्या: द्रुपद इस बात से बहुत दुखी हैं कि उन्होंने द्रोण के वध और अर्जुन के विवाह के लिए यज्ञ किया था, किंतु अर्जुन के न रहने पर उनकी वह यज्ञीय कन्या (द्रौपदी) किसके पास जाएगी।
श्लोक 19 से 27 (पुरोहित का समझाना और द्रौपदी के स्वयंवर की घोषणा)
श्लोक 19, 20 और 21:
ब्राह्मण उवाच।1-182-18x इत्येवमुक्त्वा पाञ्चालः शुशोच परमातुरः।। दृष्ट्वा शोचन्तमत्यर्थं पाञ्चालमिदमब्रवीत्। पुरोधाः सत्वसंपन्नः सम्यग्विद्याविशेषवित्।।1-182-19a 1-182-19b वृद्धानुशासने सक्ताः पाण्डवा धर्मचारिणः। तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम्।।1-182-20a 1-182-20b मया दृष्टमिदं सत्यं शृणु त्वं मनुजाधिप। ब्राह्मणैः कथितं सत्यं वेदेषु च मया श्रुतम्।।1-182-21a 1-182-21b
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने कहा— ऐसा कहकर पाँचालराज द्रुपद अत्यधिक आतुर होकर शोक करने लगे। तब उन्हें अत्यधिक शोक करते हुए देखकर, सत्त्वसंपन्न और विद्याओं के विशेष ज्ञाता उनके पुरोहित ने उनसे यह बात कही— "वृद्धों की शिक्षा का पालन करने वाले और धर्मचारी पाण्डव ऐसे हैं कि वे कभी नष्ट नहीं हो सकते और न ही कभी पराभव (पराजय/मृत्यु) को प्राप्त हो सकते हैं। हे मनुजाधिप! मैंने जो देखा है, वह सत्य है, उसे सुनो। ब्राह्मणों द्वारा भी यही कहा गया है और मैंने वेदों में भी यही सुना है।"
- व्याख्या: द्रुपद के पुरोहित उन्हें ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं कि धर्मात्मा पाण्डव इतनी आसानी से नहीं मर सकते, वे अवश्य जीवित हैं।
श्लोक 22, 23 और 24:
बृहस्पतिमतेनाथ पौलोम्या च पुरा श्रुतम्। नष्ट हन्द्रो बिसग्रन्थ्यामुपश्रुत्या हि दर्शितः।।1-182-22a 1-182-22b उपश्रुतिर्महाराज पाण्डवार्थे मया श्रुता। यत्रकुत्रापि जीवन्ति पाण्डवास्ते न संशयः।।1-182-23a 1-182-23b मया दृष्टानि लिङ्गानि इहैवैष्यन्ति पाण्डवाः। यन्निमित्तमिहायान्ति तच्छृणुष्व नराधिप।।1-182-24a 1-182-24b
- हिन्दी अनुवाद: "बृहस्पति के मत से और प्राचीन काल में पौलोमी (इंद्राणी) के प्रसंग में मैंने सुना था कि कमल की जड़ (बिसग्रन्थि) में छिपे हुए नष्ट हुए से प्रतीत होने वाले इंद्र को 'उपश्रुति' के द्वारा ढूँढकर दिखाया गया था। हे महाराज! पाण्डवों के संबंध में भी मैंने वैसी ही उपश्रुति (रहस्यमयी आकाशवाणी/संकेत) सुनी है। पाण्डवा जहाँ कहीं भी हों, वे जीवित अवश्य हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने ऐसे लक्षण देखे हैं जिनसे पाण्डव यहीं (हमारे पास) आएंगे। वे जिस उद्देश्य से यहाँ आएंगे, हे नराधिप! उसे आप सुनिए।"
- व्याख्या: पुरोहित अपने प्राचीन ज्ञान और संकेतों के आधार पर राजा द्रुपद को आश्वस्त करता है कि पाण्डव मरे नहीं हैं, बल्कि वे जीवित हैं और शीघ्र ही यहाँ आने वाले हैं।
श्लोक 25, 26 और 27:
स्वयंवरः क्षत्रियाणां कन्यादाने प्रदर्शितः। स्वयंवरस्तु नगरे घुष्यतां राजसत्तम।।1-182-25a 1-182-25b यत्र वा निवसन्तस्ते पाण्डवाः पृथया सह। दूरस्था वा समीपस्था स्वर्गस्था वाऽपि पाण्डवाः।।1-182-26a 1-182-26b श्रुत्वा स्वयंवरं राजन्समेष्यन्ति न संशयः। तस्मात्स्वयंवरो राजन्घुष्यतां मा चिरं कृथाः।।1-182-27a 1-182-27b
- हिन्दी अनुवाद: "कन्या के दान के लिए क्षत्रियों में स्वयंवर की प्रथा प्रदर्शित की जाती है। इसलिए हे राजसत्तम! आप अपने नगर में द्रौपदी के स्वयंवर की घोषणा करवा दीजिए। माता कुन्ती के साथ पाण्डव चाहे जहाँ भी निवास कर रहे हों— चाहे वे दूर हों, पास हों, या स्वर्गवासी भी हो गए हों (यदि जीवित होंगे तो)— हे राजन्! स्वयंवर का समाचार सुनकर वे निश्चित रूप से यहाँ आ मिलेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिए हे राजन्! आप बिना कोई देर किए तुरंत स्वयंवर की घोषणा करवा दीजिए।"
- व्याख्या: पुरोहित युक्ति सुझाता है कि यदि द्रौपदी के स्वयंवर की विशाल घोषणा पूरे देश में कर दी जाए, तो जीवित होने पर पाण्डव अवश्य ही पाँचाल देश पहुँचेंगे।
श्लोक 28 से 36 (स्वयंवर की तिथि की घोषणा और आमंत्रण)
श्लोक 28, 29 और 30:
ब्राह्मण उवाच।1-182-28x श्रुत्वा पुरोहितेनोक्तं पाञ्चालः प्रीतिमांस्तदा। घोषयामास नगरे द्रौपद्यास्तु स्वयंवरम्।।1-182-28a 1-182-28b पुष्यमासे तु रोहिण्यां शुक्लपक्षे शुभे तिथ तिथौ। दिवसैः पञ्चसप्तत्या भविष्यति न संशयः।।1-182-29a 1-182-29b देवगन्धर्वयक्षाश्च ऋषयश्च तपोधनाः। स्वयंवरं द्रष्टुकामा गच्छन्त्येव न संशयः।।1-182-30a 1-182-30b
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने आगे कहा— पुरोहित की बात सुनकर पाँचालराज (द्रुपद) को बहुत प्रसन्नता हुई, और उन्होंने नगर में द्रौपदी के स्वयंवर की घोषणा करवा दी। वह स्वयंवर पौष मास में रोहिणी नक्षत्र और शुक्ल पक्ष की शुभ तिथि पर, आज से पचहत्तर (75) दिनों के बाद होना तय हुआ, इसमें कोई संशय नहीं है। देवता, गंधर्व, यक्ष और तपोधन ऋषिगण भी उस स्वयंवर को देखने की इच्छा से वहाँ अवश्य जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
- व्याख्या: द्रुपद को पुरोहित की बात जँच गई और उन्होंने पौष मास की रोहिणी नक्षत्र में द्रौपदी के स्वयंवर की भव्य घोषणा करवा दी।
श्लोक 31, 32 और 33:
तव पुत्रा महात्मानो दर्शनीयो विशेषतः। यदृच्छया सा पाञ्चाली गच्छेद्वान्यतमं पतिम्।।1-182-31a 1-182-31b को हि जानाति लोकेषु प्रजापतिमतं शुभण्। तस्मात्सपुत्रा गच्छेथा यदि ब्राह्मणि रोचते।।1-182-32a 1-182-32b नित्यकालं सुभिक्षास्ते पाञ्चालास्तु तपोधने। यज्ञसेनस्तु राजा स ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः।।1-182-33a 1-182-33b
- हिन्दी अनुवाद: (अतिथि ब्राह्मण पाण्डवों और कुन्ती से कहता है)— "आपके वे महात्मान पुत्र भी बहुत सुंदर और दर्शनीय हैं। संयोगवश वह पाँचालकन्या (द्रौपदी) उनमें से किसी को भी अपना पति चुन सकती है। इस संसार में प्रजापति (ब्रह्म) के शुभ संकल्प को कौन जानता है? इसलिए हे ब्राह्मणी (कुन्ती)! यदि आपको रुचि हो, तो आप अपने पुत्रों के साथ वहाँ चल सकती हैं। हे तपोधने! पाँचाल देश में हमेशा अन्न-धन की प्रचुरता (सुभिक्षा) रहती है। वहाँ के राजा यज्ञसेन (द्रुपद) ब्राह्मणों के भक्त और सत्यप्रतिज्ञा वाले हैं।"
- व्याख्या: कथा सुनाते हुए वह अतिथि ब्राह्मण माता कुन्ती और पाण्डवों को आमंत्रित करता है कि उन्हें भी उस स्वयंवर में अवश्य चलना चाहिए क्योंकि वहाँ सब प्रकार का सुख और स्वागत मिलेगा।
श्लोक 34, 35 और 36:
ब्रह्मण्या नागराः सर्वे ब्राह्मणाश्चातिथिप्रियाः। नित्यकालं प्रदास्यन्ति आमन्त्रणमयाचितम्।।1-182-34a 1-182-34b अहं च तत्र गच्छामि ममैभिः सह शिष्यकैः। एकसार्थाः प्रयाताः स्मो ब्राह्मण्या यदि रोचते।।1-182-35a 1-182-35b एतावदुक्त्वा वचनं ब्राह्मणो विरराम ह।।1-182-36x
- हिन्दी अनुवाद: "वहाँ के सभी नगरवासी ब्राह्मणों के भक्त और अतिथि-प्रेमी हैं, जो बिना माँगे ही निरंतर आमंत्रण और भोजन प्रदान करेंगे। हे ब्राह्मणी! यदि आपको रुचि हो, तो मैं भी अपने इन शिष्यों के साथ उसी यात्रा में जा रहा हूँ, हम सब एक ही कारवां (समूह) के साथ प्रस्थान करेंगे।" इतना वचन कहकर वह ब्राह्मण चुप हो गया।
- व्याख्या: अतिथि ब्राह्मण ने पाण्डवों और कुन्ती को द्रौपदी के स्वयंवर में साथ चलने का निमंत्रण दिया, जिसे सुनकर पाण्डवों और कुन्ती के मन में भी पांचाल देश जाने की जिज्ञासा जागृत हो गई।
