महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 229वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में देवर्षि नारद युधिष्ठिर को सुंद और उपसुंद दैत्य भाइयों की कथा सुनाना शुरू करते हैं, जिसमें उनके जन्म, विंध्य पर्वत पर कठोर तपस्या, ब्रह्माजी से वरदान प्राप्ति और उस वरदान के फलस्वरूप उनका अजेय होना वर्णित है।
श्लोक 1 से 6 (देवर्षि नारद द्वारा सुंद-उपसुंद के इतिहास का आरंभ और उनकी घनिष्ठता)
श्लोक 1, 2, 3, 4, 5 और 6:
नारद उवाच। शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम्। भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथा वृत्तं युधिष्ठिर।। महासुरस्यान्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा। निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत्।। तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ। सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणौ क्रूरमानसौ।। तावेकनिश्चयौ दैत्यावेककार्यार्थसंमतौ। निरन्तरमवर्तेतां समदुःखसुखावुभौ।। विनाऽन्योन्यं न भुञ्जाते विनाऽन्योन्यं न जल्पतः। अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदौ।। एकशीलसमाचारौ द्विधैवैकोऽभवत्कृतः। तौ विवृद्धौ महावीर्यौ कार्येष्वप्येकनिश्चयौ।।
- हिन्दी अनुवाद: नारद जी ने कहा— "हे पार्थ युधिष्ठिर! भाइयों सहित मेरे इस पुरातन इतिहास को विस्तार से सुनो, जैसा कि घटित हुआ था। प्राचीनकाल में महासुर हिरण्यकशिपु के वंश में 'निकुंभ' नाम के एक तेजस्वी और बलवान दैत्यराज हुए थे। उनके महावीर्यवान और भयानक पराक्रम वाले दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका नाम सुंद और उपसुंद था; वे दोनों दैत्यराज बड़े दारुण (क्रूर) स्वभाव और भयानक मन वाले थे। वे दोनों दैत्य एक ही निश्चय वाले, एक ही कार्य के प्रति सहमत और सुख-दुःख को समान रूप से भोगते हुए निरंतर एक साथ रहते थे। वे बिना एक-दूसरे के न तो भोजन करते थे और न ही आपस में बात किए बिना रहते थे। वे दोनों एक-दूसरे का प्रिय करने वाले और एक-दूसरे से प्रिय बोलने वाले थे। उनका शील और आचरण एक जैसा था, मानो एक ही व्यक्ति दो शरीरों में बँट गया हो। वे दोनों महावीर्यवान भाई बड़े होने पर भी प्रत्येक कार्य में एक ही निश्चय रखते थे।"
- व्याख्या: यहाँ देवर्षि नारद सुंद और उपसुंद की अद्वितीय भ्रातृ-भक्ति और एकता का वर्णन करते हैं कि वे शरीर से दो थे, किंतु प्राण और विचार से एक थे।
श्लोक 7 से 16 (विंध्य पर्वत पर उनकी उग्र तपस्या और देवताओं द्वारा विघ्न डालने के प्रयास)
श्लोक 7, 8, 9, 10, 11 और 12:
त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायैकनिश्चयम्। दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः।। तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः। क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ।। मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः। आत्ममांसानि जुह्वान्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितौ। ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ।। तयोस्तपःप्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः। धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तद्भुतमिवाभवत्।। ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः। तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे।। रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनःपुनः। न च tौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ।।
- हिन्दी अनुवाद: तीनों लोकों को जीतने के उद्देश्य से एकनिष्ठ होकर दीक्षा लेकर वे दोनों विंध्य पर्वत पर गए और उन्होंने उग्र तपस्या की। दीर्घकाल तक तपस्या करते-करते वे भूख-प्यास से परिश्रांत हो गए, जटा और वल्कल (छाल) धारण कर लिए। उनके सारे अंगों पर मैल जम गया, वे केवल वायु का भक्षण करने लगे, अपने ही शरीर के मांस की आहुति (होम) देने लगे, पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर खड़े हो गए, दोनों बाहें ऊपर उठा लीं, पलकें झपकाए बिना (अनिमिष) दीर्घकाल तक कठोर व्रत का पालन किया। उनके उस तप के प्रभाव से दीर्घकाल तक प्रतापित होकर विंध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा, जो एक अद्भुत घटना जैसी थी। तब उन दोनों का उग्र तप देखकर देवता भयभीत हो गए और उनके तप में विघ्न डालने के लिए देवताओं ने अनेक उपाय किए। उन्होंने रत्नों और सुंदर स्त्रियों द्वारा बार-बार उन दोनों को प्रलोभित किया, किंतु महाव्रती उन दोनों भाइयों ने अपने व्रत में कोई भंग (रुकावट) नहीं आने दिया।
- व्याख्या: सुंद और उपसुंद ने तीनों लोकों पर विजय पाने के लिए इतनी भयानक और कठोर तपस्या की कि प्रकृति (विंध्य पर्वत) का संतुलन बिगड़ने लगा और देवता भी काँप उठे। देवताओं के सारे प्रलोभन फेल हो गए।
श्लोक 13, 14, 15 और 16:
अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः। भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा।। प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा। भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः।। अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः। न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ।। यदा क्षोभं नोपयाति नार्तिमन्यतरस्तयोः। ततः स्त्रियस्ता भूतं च सर्वमन्तरधीयत।।
- हिन्दी अनुवाद: तब देवताओं ने उन दोनों महात्माओं के सामने एक और माया रची। शूल हाथ में लिए हुए एक राक्षस द्वारा उनकी बहनें, माताएँ, पत्नियाँ और उनके पुत्र—सबके सब प्रपात (खाई) में गिराए जाते हुए दिखाई दिए। उनके आभूषण, बाल और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गए थे। वे सब चीखते हुए उन दोनों से पुकार रहे थे— "हमारी रक्षा करो!" किंतु महान व्रत का पालन करने वाले उन दोनों भाइयों ने अपने व्रत में फिर भी कोई भंग नहीं होने दिया। जब उनमें से किसी के भी मन में कोई क्षोभ या आर्तता (व्याकुलता) उत्पन्न नहीं हुई, तब वे सभी स्त्रियाँ और वह भूत (माया) अंतर्ध्यान हो गईं।
- व्याख्या: देवताओं ने उनके पारिवारिक मोह को तोड़ने के लिए उनकी महिलाओं पर अत्याचार का मायावी दृश्य दिखाया, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए।
श्लोक 17 से 25 (ब्रह्माजी का प्रगट होना और सुंद-उपसुंद द्वारा वरदान माँगना)
श्लोक 17, 18, 19 और 20:
ततः पितामहः साक्षादभिगम्य महासुरौ। वरेण च्छ्दयामास त्रैलोक्यहितः प्रभुः।। ततः सुन्दोपसुन्दौ तौ भ्रातरौ दृढविक्रमौ। दृष्ट्वा पितामहं देवं तस्थतुः प्राञ्जली तदा।। ऊचतुश्च प्रभुं देवं ततस्तौ सहितौ तदा। आवयोस्तपसाऽनेन यदि प्रीतः पितामहः।। मायाविदावस्त्रविदौ बलिनौ कामरूपिणौ। उभावप्यमरौ स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः।।
- हिन्दी अनुवाद: तब त्रैलोक्य के हितकारी प्रभु पितामह ब्रह्माजी साक्षात् उन महासुरों के पास आए और उन्हें वरदान से संतुष्ट करने लगे। तब दृढ़ पराक्रमी वे दोनों भाई सुंद और उपसुंद पितामह देव को देखकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन दोनों ने एक साथ मिलकर प्रभु देव (ब्रह्माजी) से कहा— "हे पितामह! यदि आप हमारी इस तपस्या से प्रसन्न हैं, तो हे प्रभु! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं, तो हम दोनों माया के जानने वाले, अस्त्र-विद्या के मर्मज्ञ, बलवान, स्वेच्छा से रूप बदलने वाले (कामरूपी) और अमर (अमृतत्व को प्राप्त) हो जाएँ!"
- व्याख्या: दैत्य भाइयों की अटल तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी स्वयं प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। उन्होंने माया, अस्त्र-विद्या और अमरता का वरदान माँगा।
श्लोक 21, 22 और 23:
ब्रह्मोवाच। ऋतेऽमरत्वं युवयोः सर्वमुक्तं भविष्यति। अन्यद्वृणीतं मृत्योश्च विधानममरैः सह।। प्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः। युवयोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीयते।। त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भ्यामास्थितं तपः। हेतुनाऽनेन दैत्येन्द्रौ न वां कामं करोम्यहम्।।
- ब्रह्माजी ने कहा— "तुम दोनों को अमरता छोड़कर बाकी सब कुछ मिल जाएगा। इसके अलावा मृत्यु का कोई ऐसा विधान चुनो जो अन्य अमर जीवों (या देवताओं) के साथ हो। तुम दोनों ने जो यह महान तपस्या आरंभ की है, उसका उद्देश्य तीनों लोकों पर विजय पाना है, इसलिए हे दैत्येंद्रो! मैं तुम्हें अमरता का वरदान नहीं दे सकता।"
- व्याख्या: ब्रह्माजी ने उन्हें अमरता देने से साफ मना कर दिया, क्योंकि अमरता सृष्टि के नियम के विरुद्ध थी और उनका उद्देश्य लोक को जीतना था।
श्लोक 24 और 25:
सुन्दोपसुन्दावूचतुः। त्रिषु लोकेषु यद्भूतं किंचित्स्थावरजङ्गमम्। सर्वस्मान्नौ भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह।। पितामह उवाच। यत्प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद्ददानि वाम्। मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद्वा भविष्यति।।
- सुंद और उपसुंद बोले— "हे पितामह! तीनों लोकों में जितने भी स्थावर और जंगम (चर-अचर) प्राणी हैं, उन सबसे हमें कभी कोई भय न हो— सिवाय हम दोनों के आपस के (अर्थात हम दोनों एक-दूसरे को छोड़कर किसी से न मरें)।" पितामह ब्रह्माजी बोले— "तुमने जो प्रार्थना की है और जैसा कहा है, तुम्हारी यह मनोकामना मैं पूर्ण करता हूँ। मृत्यु का ऐसा ही विधान (आपसी वध को छोड़कर अद्ध्य होने का) भली-भांति होगा।"
- व्याख्या: सुंद और उपसुंद ने ऐसा चतुराई भरा वरदान माँगा कि उन्हें संसार का कोई भी जीव या देवता न मार सके; वे केवल आपस में एक-दूसरे के द्वारा ही मारे जा सकते थे, क्योंकि उन्हें अपने आपसी प्रेम पर अटूट विश्वास था कि वे कभी लड़ नहीं सकते।
श्लोक 26 से 33 (वरदान पाकर दैत्यों का लौटना और उनके घर में उत्सव व आनंद)
श्लोक 26, 27, 28, 29, 30, 31, 32 और 33:
नारद उवाच। ततः पितामहो दत्त्वा वरमेतत्तदा तयोः। निवर्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह।। लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तौ भ्रातरावुभौ। अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ।। तौ तु लब्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामौ मनस्विनौ। सर्वः सुहृञ्जनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजगमिवान्।। ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ संबभूवतुः। महार्हाभरणोपेतौ विरजोम्बरधारिणौ।। अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम्। नित्यः प्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृञ्जनः।। भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति। गीयेतां पीयतां चेति शब्दश्चासीद्गृहे गृहे।। तत्रतत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितैः। हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत्पुरम्।। तैस्तैर्विहारैर्बहुभिर्दैत्यानां कामरूपिणाम्। समाः संक्रीडतां तेषामहरेकमिवाभवत्।।
- हिन्दी अनुवाद: नारद जी ने कहा— "तदनंतर पितामह ब्रह्माजी उन्हें वह वरदान देकर और उनकी तपस्या समाप्त कराकर ब्रह्मलोक चले गए। वे दोनों दैत्यराज उन वरदानों को पाकर और सर्वलोक के लिए अवध्य (जिन्हें कोई न मार सके) बनकर अपने घर लौट आए। उन दोनों को वरदान प्राप्त और अपनी मनोकामना पूर्ण हुआ देख उनके सभी संबंधी अत्यधिक हर्षित हुए। तब उन दोनों ने अपनी जटाओं को कटवाकर सुंदर मुकुट धारण किए, बहुमूल्य आभूषण पहने और निर्मल वस्त्र धारण किए। उन्होंने अपने राज्य में सदा (हर समय) अकाल कौमुदी (उत्सव) जैसा माहौल बना दिया। उनके सभी सगे-संबंधी हमेशा प्रमुदित रहने लगे। उनके घर-घर में 'खाओ, पनो, दान करो, रमण करो, गीत गाओ और मदिरा पियो' ऐसे ही शब्द गूँजने लगे। जगह-जगह महान नाद और भुजाओं की थाप (तलनादित) से दैत्यों का वह पूरा नगर हर्ष और उल्लास से भर गया। कामरूपी दैत्यों के विभिन्न प्रकार के विहारों (आनंद-क्रीड़ाओं) के बीच उनके कई वर्ष ऐसे बीत गए जैसे मानो एक ही दिन हो!"
- व्याख्या: अजेय वरदान पाकर सुंद और उपसुंद अहंकारी बन गए। उन्होंने पूरी दैत्य नगरी में जश्न और विलासिता का माहौल बना दिया और वे शक्ति के नशे में चूर होकर तीनों लोकों को कुचलने की तैयारी करने लगे।
इसी के साथ 229वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
