महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 230वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में सुंद और उपसुंद द्वारा वरदान के अहंकार में तीनों लोकों, देवताओं, यज्ञ करने वाले ऋषियों और ब्राह्मणों पर किए गए भयानक अत्याचारों तथा संपूर्ण पृथ्वी के उजड़ने का सजीव वर्णन किया गया है।
श्लोक 1 से 5 (सुंद और उपसुंद का तीनों लोकों पर आक्रमण और प्रस्थान)
श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5:
नारद उवाच। उत्सवे वृत्तमात्रे तु त्रैलोक्याकाङ्क्षिणावुभौ। मन्त्रयित्वा ततः सेनां तावज्ञापयतां तदा।। सुहृद्भिरप्यनुज्ञातौ दैत्यैर्वद्धैश्च मन्त्रिभिः। कृत्वा प्रास्थानिकं रात्रौ मघासु ययतुस्तदा।। गदापिट्टशधारिण्या शूलमुद्गरहस्तया। प्रस्थितौ सह वर्मिण्या महत्या दैत्यसेनया।। मङ्गलैः स्तुतिभिश्चापि विजयप्रतिसंहितैः। चारणैः स्तूयमानौ तौ जग्मतुः परया मुदा।। तावन्तरिक्षमुत्प्लुत्य दैत्यौ कामगमावुभौ। देवानामेव भवनं जग्मतुर्युद्दुर्मदौ।।
- हिन्दी अनुवाद: नारद जी ने कहा— "उत्सव समाप्त होते ही तीनों लोकों की आकांक्षा करने वाले उन दोनों भाइयों ने आपस में मंत्रणा करके अपनी सेना को प्रस्थान की आज्ञा दी। अपने सुहृदों, दैत्य और वृद्ध मंत्रियों द्वारा अनुज्ञा प्राप्त कर, उन्होंने मघा नक्षत्र की रात्रि में प्रस्थान का शुभ मुहूर्त कर यात्रा शुरू की। वे दोनों गदा, पट्टिश, शूल और मुदगर धारण करने वाली, कवच पहने हुए विशाल दैत्य सेना के साथ आगे बढ़े। विजय की कामना वाले मंगल गानों और स्तुतियों द्वारा चारणों (स्तुति पाठकों) द्वारा स्तुति किए जाते हुए वे दोनों अत्यधिक प्रसन्नता के साथ आगे बढ़े। स्वेच्छा से आकाश में गमन करने वाले, युद्ध के मद में चूर वे दोनों दैत्य अंतरिक्ष में उछलकर सीधे देवताओं के भवन (स्वर्ग) की ओर चल पड़े।"
- व्याख्या: वरदान के नशे में चूर होकर सुंद और उपसुंद अपनी भारी-भरकम और सशस्त्र सेना के साथ स्वर्ग और तीनों लोकों को रौंदने के लिए निकल पड़े।
श्लोक 6 से 8 (देवताओं का पलायन और सुंद-उपसुंद द्वारा अन्य लोकों की विजय)
श्लोक 6, 7 और 8:
तयोरागमनं ज्ञात्वा वरदानं च तत्प्रभोः। हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्ब्रह्मलोकं ततः सुराः।। ताविन्द्रलोकं निर्जित्य यक्षरक्षोगणांस्तदा। खेचराण्यपि भूतानि जघ्नतुस्तीव्रविक्रमौ।। अन्तर्भूमिगतान्नागाञ्जित्वा तौ च महारथौ। समुद्रवासिनीः सर्वा म्लेच्छजातीर्विजिग्यतुः।।
- हिन्दी अनुवाद: उनके आगमन और प्रभु (ब्रह्माजी) से मिले उस वरदान को जानकर देवता त्रिविष्टप (स्वर्ग) को छोड़कर ब्रह्मलोक की ओर भाग गए। उन दोनों तीव्र पराक्रमी महारथियों ने इंद्रलोक को जीतकर यक्षों, राक्षसों के समूहों तथा आकाश में विचरने वाले भूतों का भी संहार कर डाला। पृथ्वी के भीतर पाताल लोक में निवास करने वाले नागों को जीतकर उन दोनों ने समुद्र के तट पर रहने वाली सभी म्लेच्छ जातियों को भी परास्त कर दिया।
- व्याख्या: ब्रह्माजी के वरदान के कारण कोई भी देवता या प्राणी उनका सामना नहीं कर सका। डर के मारे देवता स्वर्ग छोड़कर ब्रह्मलोक भाग गए, और दोनों दैत्यों ने स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी के सभी कोनों को जीत लिया।
श्लोक 9 से 18 (ऋषियों, यज्ञों और ब्राह्मणों पर अत्याचार तथा धर्म का विनाश)
श्लोक 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17 और 18:
ततः सर्वां महीं जेतुमारब्धावुग्रशासनौ। सैनिकांश्च समाहूय सुतीक्ष्णं वाक्यमूचतुः।। राजर्षयो महायज्ञैर्हव्यकव्यैर्द्विजातयः। तेजो बलं च देवानां वर्धन्ति श्रियं तथा।। तेषामेवं प्रवृत्तानां सर्वेषामसुरद्विषाम्। संभूय सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः।। एवं सर्वान्समादिश्य पूर्वतीरे महोदधेः। क्रूरां मतिं समास्थाय जग्मतुः सर्वतोमुखौ।। यज्ञैर्यजन्ति ये केचिद्याजयन्ति च ये द्विजाः। तान्सर्वान्प्रसभं हत्वा बलिनौ जग्मतुस्ततः।। आश्रमेष्वग्निहोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम्। गृहीत्वा प्रक्षिपन्त्यप्सु विश्रब्धं सैनिकास्तयोः।। तपोधनैश्च ये क्रुद्धैः शापा उक्ता महात्मभिः। नाक्रामन्त तयोस्तेऽपि वरदाननिराकृताः।। नाक्रामन्त यदा शापा बाणा मुक्ताः शिलास्विव। नियमान्संपरित्यज्य व्यद्रवन्त द्विजातयः।। पृथिव्यां ये तपःसिद्धा दान्ताः शमपरायणाः। तयोर्भयाद्दुद्रुवुस्ते वैनतेयादिवोरगाः।। मथितैराश्रमैर्भग्नैर्विकीर्णकलशस्रुवैः। शून्यमासीज्जगत्सर्वं कालेनेव हतं तदा।।
- हिन्दी अनुवाद: इसके बाद उन उग्र शासन वाले दोनों भाइयों ने संपूर्ण पृथ्वी को जीतने का उपक्रम किया और अपने सैनिकों को बुलाकर यह अत्यंत तीक्ष्ण (क्रूर) बात कही— "राजर्षि लोग महायज्ञों द्वारा तथा ब्राह्मण हव्य-कव्य (आहुतियों) द्वारा देवताओं के तेज, बल और उनकी श्री (समृद्धि) को बढ़ाते हैं। इसलिए असुरों के उन समस्त शत्रुओं का हम सबको मिलकर सर्वप्रकारेण वध करना चाहिए!" ऐसा सबको आदेश देकर, समुद्र के पूर्वी तट पर अपनी क्रूर बुद्धि को स्थिर कर वे दोनों सब ओर फैल गए। जो कोई भी यज्ञ करते थे या जो ब्राह्मण यज्ञ कराते थे, उन सबका बलपूर्वक वध करके वे आगे बढ़ते गए। उनके सैनिक शांतचित्त मुनियों के आश्रमों में जाकर उनके अग्निहोत्र के जल को उठाकर पानी में फेंक देते थे। महात्मान तपोधन ऋषियों ने जब क्रोधित होकर उन्हें शाप देना चाहा, तब ब्रह्माजी के वरदान के कारण उन दैत्यों पर वे शाप असर नहीं कर पाए। जब मुनियों के छोड़े हुए शाप उन पर ऐसे निष्प्रभाव हो गए जैसे पत्थरों पर बाण छोड़े जाते हैं, तब ब्राह्मण अपने नियम छोड़कर भयभीत होकर भाग खड़े हुए। पृथ्वी पर जितने भी तपःसिद्ध, शांत और शमपरायण मुनि थे, वे उन दोनों के भय से ऐसे भाग गए जैसे गरुड़ (वैनतेय) के भय से सर्प भाग जाते हैं। आश्रमों के कुचल दिए जाने, यज्ञ-पात्रों व कलश-स्रुवों के बिखर जाने से सारा जगत ऐसा शून्य हो गया मानो महाकाल द्वारा नष्ट कर दिया गया हो।
- व्याख्या: सुंद और उपसुंद ने यह समझ लिया कि देवताओं की शक्ति का स्रोत यज्ञ, तपस्या और ब्राह्मण हैं। इसलिए उन्होंने पृथ्वी पर होने वाले सभी यज्ञों को बंद कराने और मुनियों-ऋषियों को प्रताड़ित करने का महापाप शुरू कर दिया। उनके शाप भी वरदान के आगे निष्फल हो गए।
श्लोक 19 से 27 (दैत्यों के मायावी रूप, पृथ्वी की भयावह स्थिति और कुरुक्षेत्र में निवास)
श्लोक 19, 20 और 21:
ततो राजन्नदृश्यद्भिर्ऋषिभिश्च महासुरौ। उभौ विनिश्चयं कृत्वा विकुर्वाते वधैषिणौ।। प्रभिन्नकरटौ मत्तौ भूत्वा कुञ्जररूपिणौ। संलीनमपि दुर्गेषु निन्यतुर्यमसादनम्।। सिंहौ भूत्वा पुनर्व्याघ्रौ पुनश्चान्तर्हितावुभौ। तैस्तैः उपायैस्तौ क्रूरावृषीन्दृष्ट्वा निजघ्नतुः।।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! इसके बाद जब ऋषिगण दृश्यों से ओझल होकर छिप गए, तब उन दोनों महासुरों ने वध करने की इच्छा से एक और निश्चय किया। वे दोनों मदमस्त, कनपटी से मद बहाने वाले बड़े-बड़े हाथियों का रूप धारण कर लेते थे और दुर्गम स्थानों में छिपे हुए मुनियों को भी यमलोक पहुँचा देते थे। कभी सिंह, कभी बाघ और कभी अदृश्य होकर वे उन क्रूर उपायों से ऋषियों को ढूँढ-ढूँढकर मार डालते थे।
- व्याख्या: दैत्यों ने खूंखार जानवरों (हाथी, शेर, बाघ) के रूप बदलकर छिपकर तपस्या कर रहे ऋषियों का बेरहमी से संहार किया।
श्लोक 22, 23, 24 और 25:
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया प्रनष्टनृपतिद्विजा। उत्सन्नोत्सवयज्ञा च बभूव वसुधा तदा।। हाहाभूता भयार्ता च निवृत्तविपणापणा। निवृत्तदेवकार्या च पुण्योद्वाहविवर्जिता।। निवृत्तकृषिगोरक्षा विध्वस्तनगराश्रमा। अस्थिकङ्कालसंकीर्णा भूर्बभूवोग्रदर्शना।। निवृत्तपितृकार्यं च निर्वषट्कारमङ्गलम्। जगत्प्रतिभयाकारं दुष्प्रेक्ष्यमभवत्तदा।।
- हिन्दी अनुवाद: उस समय पृथ्वी पर यज्ञ और स्वाध्याय (वेदाध्ययन) बंद हो गए थे; राजा और ब्राह्मण नष्ट हो चुके थे। उत्सव और यज्ञ पूरी तरह समाप्त हो गए थे। पूरी पृथ्वी हाहाकार और भय से आर्त हो उठी थी। बाजारों और दुकानों की गतिविधियाँ रुक गई थीं, देव-कार्य बंद हो गए थे और पवित्र विवाह-संस्कार भी वर्जित हो गए थे। कृषि और गोरक्षा का कार्य छूट गया था, नगर और आश्रम पूरी तरह विध्वस्त हो चुके थे। वह पृथ्वी जगह-जगह मानव हड्डियों और कंकालों से पट जाने के कारण अत्यंत उग्र (भयानक) दिखाई देने लगी। पितृ-कार्य (श्राद्ध आदि) और 'वषट्कार' (यज्ञीय मंत्र) तथा सभी मंगल कार्य बंद हो चुके थे। वह समस्त संसार अत्यंत भयानक और देखने में असह्य बन गया था।
- व्याख्या: इन श्लोकों में सुंद और उपसुंद के अत्याचारों से पूरी पृथ्वी के श्मशान में बदलने का हृदय विदारक चित्रण है। धर्म, संस्कृति, कृषि और मानव सभ्यता का नामोनिशान मिटने लगा था।
श्लोक 26 और 27:
चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तारा नक्षत्राणि दिवौकसः। जग्मुर्विषादं तत्कर्म दृष्ट्वा सुन्दोपसुन्दयोः।। एवम् सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा। निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः।।
- हिन्दी अनुवाद: चंद्रमा, सूर्य, ग्रह, तारे, नक्षत्र और स्वयं देवगण— सुंद और उपसुंद के उन क्रूर कर्मों को देखकर भारी विषाद (दुःख और चिंता) में डूब गए। इस प्रकार उन दोनों दैत्यों ने अपने क्रूर कर्मों से सभी दिशाओं को जीतकर, अपने सभी शत्रुओं से रहित (निःसपत्न) होकर कुरुक्षेत्र में अपना निवास (डेरा) बना लिया।
- व्याख्या: प्रकृति और आकाशीय पिंड भी इस अधर्म और तांडव से दुःखी थे। अंततः संपूर्ण पृथ्वी को अपने वश में करने के बाद दोनों दैत्य कुरुक्षेत्र में आकर ठहर गए।
इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 230वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
