महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४२

महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४२

महाभारत के आदिपर्व (सुभद्राहरण पर्व) के 242वें अध्याय में अर्जुन द्वारा सुभद्रा को गंधर्व विवाह के विधि-विधान समझाना, सुभद्रा का लज्जा और प्रेमवश मौन रहना, तथा देवराज इंद्र, नारद और अन्य महर्षियों की उपस्थिति में श्रीकृष्ण एवं यादवों द्वारा विधिपूर्वक उनके विवाह संपन्न कराए जाने का अद्भुत वर्णन है।

इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 5

वैशंपायन उवाच। कुकुरान्धकवृष्णीनामपयानं च पाण्डवः। विनिश्चित्य ततः पार्थः सुभद्रामिदमब्रवीत्।। 1 ।। शृणु भद्रे यथाशास्त्रं हितार्थं मुनिभिः कृतम्। विवाहं बहुधा सत्सु वर्णानां धर्मसंयुतम्।। 2 ।। कन्यायास्तु पिता भ्राता माता मातुल एव वा। पितुः पिता पितुर्भ्राता दाने तु प्रभुतां गतः।। 3 ।। महोत्सवं पशुपतेर्द्रष्टुकामः पिता तव। अन्तर्द्वीपं गतो भद्रे पुत्रैः पौत्रैः सबान्धवैः।। 4 ।। मम चैव विशालाक्षि विदेशस्था हि बान्धवाः। तस्मात्सुभद्रे गान्धर्वो विवाहः पञ्चमः स्मृतः।। 5 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—कुकुर, अंधक और वृष्णिवंशियों के प्रस्थान (द्वीप पर जाने) को निश्चित रूप से जानकर अर्जुन ने सुभद्रा से कहा—"हे भद्रे! शास्त्रों में मुनियों द्वारा लोकहित के लिए बताए गए विभिन्न प्रकार के धर्मयुक्त विवाहों को सुनो। कन्यादान में पिता, भाई, माता, मामा, दादा या चाचा का अधिकार होता है। हे भद्रे! तुम्हारे पिता अपने पुत्रों, पौत्रों और सगे-सम्बन्धियों के साथ पशुपति (महादेव) का महोत्सव देखने के लिए अंतर्द्वीप गए हुए हैं। हे विशालाक्षि! और मेरे भी सगे-सम्बन्धियों इस समय विदेश (इंद्रप्रस्थ) में हैं। इसलिए हे सुभद्रा! हमारे लिए पाँचवाँ 'गंधर्व विवाह' ही उपयुक्त है।"

व्याख्या: जब पूरी द्वारका नगरी और यादव परिवार उत्सव के लिए समुद्र के द्वीप पर चला गया, तब अर्जुन ने सुभद्रा के सामने गंधर्व विवाह का प्रस्ताव रखा। उन्होंने समझाया कि चूँकि इस समय न तो कन्या के पिता या भाई पास हैं और न ही उनके स्वयं के परिजन उपस्थित हैं, अतः आपसी सहमति पर आधारित गंधर्व विवाह शास्त्रसम्मत है।

श्लोक 6 - 13

समागमे तु कन्यायाः क्रियाः प्रोक्ताश्चतुर्विधाः। तेषां प्रवृत्तिं साधूनां शृणु माधवि तद्यथा।। 6 ।। वरमाहूय विधिना पित्रा दत्ता तथार्थिने। सा पत्नी तु परैरुक्ता सा वश्या तु पतिव्रता।। 7 ।। भृत्यानां भरणार्थाय आत्मनः पोषणाय च। दाने गृहीता या नारी सा भार्येति स्मृता बुधैः।। 8 ।। धर्मतो वरयित्वा तु आनीय स्वं निवेशनम्। न्यायेन दत्तातारुण्ये दाराः पितृकृताः स्मृताः।। 9 ।। गान्धर्वेण विवाहेन रागात्पुत्रार्थकारणात्। आत्मनाऽनुगृहीता या वश्या सा तु प्रजावती।। 10 ।। जनयेद्या तु भर्तारं जाया इत्येव नामतः। पत्नी भार्या च दाराश्च जाया चेति चतुर्विधाः।। 11 ।। चतस्र एवाग्निसाक्ष्याः क्रियायुक्ताश्च धर्मतः। गान्धर्वस्तु क्रियाहीनो रागादेव प्रवर्तते।। 12 ।। सकामायाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः। मयोक्तमक्रियं च अपि कर्तव्यं माधवि त्वया।। 13 ।।

अनुवाद: "हे माधवि! कन्या के विवाह की चार प्रमुख क्रियाएँ (प्रकार) साधु पुरुषों द्वारा कही गई हैं, उनकी प्रवृत्ति सुनो:

  1. पत्नी: पिता द्वारा विधिपूर्वक वर को बुलाकर और प्रार्थना करने पर जो कन्या उसे दी जाती है, वह 'पत्नी' कहलाती है (यह ब्रह्म विवाह आदि का रूप है)।
  2. भार्या: सेवकों के भरण-पोषण और अपने पोषण के लिए दानस्वरूप (मूल्य या कार्य के संदर्भ में) जो नारी ग्रहण की जाती है, उसे बुद्धिमानों ने 'भार्या' कहा है (असुर/राक्षस आदि रूपों में)।
  3. दारा: धर्मपूर्वक वर का वरण करके घर लाकर, युवावस्था में माता-पिता द्वारा न्यायोचित ढंग से जो कन्या दी जाती है, वे 'दारा' कहलाते हैं।
  4. जाया: गंधर्व विवाह के द्वारा प्रेम और संतान प्राप्ति के लिए जो अपनी इच्छा से परस्पर स्वीकृत होती है, वह वश्या और प्रजावती होती है। जो पति को जन्म देती है (अर्थात जिससे संतान उत्पन्न होती है), वह 'जाया' कहलाती है। इस प्रकार पत्नी, भार्या, दारा और जाया—ये चार प्रकार की पत्नियाँ अग्नि की साक्षी से धर्मयुक्त होती हैं। किंतु गंधर्व विवाह बिना किसी कर्मकांड या अग्नि के केवल परस्पर प्रेम से उत्पन्न होता है। यह कामेच्छा से युक्त स्त्री और पुरुष द्वारा एकांत में बिना मंत्रों के संपन्न होता है। हे माधवि! मैंने जो यह बिना क्रिया (बिना कर्मकांड) का गंधर्व विवाह बताया है, तुम्हें वही करना चाहिए।"

व्याख्या: अर्जुन ने विवाह के विभिन्न वैदिक और लौकिक रूपों (पत्नी, भार्या, दारा, जाया) का विस्तार से उल्लेख किया और यह स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में बिना मंत्रों और अग्नि के, केवल परस्पर प्रेम और सहमति पर आधारित 'गंधर्व विवाह' ही उनके लिए सबसे उचित मार्ग है।

श्लोक 14 - 20

अयनं चैव मासश्च ऋतुः पक्षस्तथा तिथिः। करणं च मुहूर्तं च लग्नसंपत्तथैव च।। 14 ।। विवाहस्य विशालाक्षि प्रशस्तं चोत्तरायणम्। वैशाखश्चैव मासानां पक्षाणां शुक्ल एव च।। 15 ।। नक्षत्राणां तथा हस्तस्तृतीया च तिथिष्वपि। लग्नो हि मकरः श्रेष्ठः करणानां बवस्तथा।। 16 ।। मैत्रो मुहूर्तो वैवाह्य आवयोः शुभकर्मणि। सर्वसंपदियं भद्रे अद्य रात्रौ भविष्यति।। 17 ।। भगवानस्तमभ्येति आदित्यस्तपतां वरः। रात्रौ विवाहकालोऽयं भविष्यति न संशयः।। 18 ।। नारायणोऽपि सर्वज्ञो नावबुध्येत विश्वकृत्। धर्मसङ्कटमापन्ने किं नु कृत्वा सुखं भवेत्।। 19 ।। मनोभवेन कामेन मोहितं मां प्रलापिनम्। प्रतिवाक्यं च मे देवि किं न वक्ष्यसि माधवि।। 20 ।।

अनुवाद: "हे विशालाक्षि! विवाह के लिए अयन, मास, ऋतु, पक्ष, तिथि, करण, मुहूर्त, लग्न और नक्षत्र की पूर्ण संपन्नता आवश्यक होती है। विवाह के लिए उत्तरायण का समय प्रशस्त है। महीनों में वैशाख मास, पक्षों में शुक्ल पक्ष, नक्षत्रों में हस्त नक्षत्र और तिथियों में तृतीया तिथि श्रेष्ठ मानी गई है। लग्नों में मकर लग्न और करणों में बव करण श्रेष्ठ है। हमारे इस शुभ कार्य के लिए आज की रात्रि में ही 'मैत्र मुहूर्त' विवाह का सुयोग ला रहा है और सारी संपत्तियाँ आज रात ही अनुकूल हो रही हैं। तपषियों में श्रेष्ठ सूर्यदेव अस्ताचल की ओर जा रहे हैं, और इसमें कोई संदेह नहीं कि आज रात ही विवाह का सुअवसर है। सर्वज्ञ और विश्वरचयिता भगवान नारायण (श्रीकृष्ण) भी शायद इस धर्मसंकट की स्थिति में यही चाहेंगे कि ऐसा क्या किया जाए जिससे सबको सुख मिले। कामदेव से मोहित होकर प्रलाप कर रहे मेरे इन वचनों का हे देवि माधवि! तुम प्रतिउत्तर क्यों नहीं दे रही हो?"

व्याख्या: अर्जुन ज्योतिषीय और मुहूर्त के दृष्टिकोण से भी यह सिद्ध करते हैं कि आज की रात का समय विवाह के लिए अत्यंत उत्तम है। वे सुभद्रा से आग्रह करते हैं कि वे उनके प्रेमपूर्ण वचनों का उत्तर दें और इस गंधर्व विवाह के लिए अपनी सहमति प्रदान करें।

श्लोक 21 - 30

वैशंपायन उवाच। अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा चिन्तयन्ती जनार्दनम्। नोवाच किंचिद्वचनं बाष्पदूषितलोचना।। 21 ।। रागोन्मादप्रलापी सन्नर्जुनो जयतां वरः। चिन्तयामास पितरं प्रविश्य च लतागृहम्।। 22 ।। चिन्तयानं तु कौन्तेयं मत्वा शच्या शचीपतिः। सहितो नारदाद्यैश्च मुनिभिश्च महामनाः।। 23 ।। गन्धर्वैरप्सरोभिश्च चारणैश्चापि गुह्यकैः। अरुन्धत्या वसिष्ठेन ह्याजगाम कुशस्थलीम्।। 24 ।। चिन्तितं च सुभद्रायाश्चिन्तयित्वा जनार्दनः। निद्रयापहृतज्ञानं रौहिणेयं विना तदा।। 25 ।। सहाक्रूरेण शिनिना सत्यकेन गदेन च। वसुदेवेन देवक्या आहूकेन च धीमता।। 26 ।। आजगाम पुरीं रात्रौ द्वारकां स्वजनैर्वृतः। पूजयित्वा तु देवेशो नारदादीन्महायशाः।। 27 ।। कुशलप्रश्नमुक्त्वा तु देवेन्द्रेणाभियाचितः। वैवाहिकीं क्रियां कृष्णः स तथेत्येवमुक्तवान्।। 28 ।। आहुको वसुदेवश्च सहाक्रूरः ससात्यकिः। अभिप्रणम्य शिरसा पाकशासनमब्रुवन्। देवदेव नमस्तेस्तु लोकनाथ जगत्पते।। 29 ।। वयं धन्याः स्म सहितैर्बान्धवैः सहिताः प्रभो। कृतप्रसादास्तु वयं तव वाक्येन विश्वजित्।। 30 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—अर्जुन की बात सुनकर और श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए सुभद्रा की आँखें आँसुओं से भर गईं और उन्होंने संकोचवश कोई उत्तर नहीं दिया। प्रेम और उन्माद में प्रलाप करते हुए वे श्रेष्ठ विजयी अर्जुन लतागृह में प्रवेश कर अपने भाग्य और परिजनों का चिंतन करने लगे। कौन्तेय अर्जुन की इस चिंता को देवराज इंद्र (शचीपति) ने जान लिया। तब महामनीषी इंद्र, शची, नारद आदि महर्षियों, गंधर्वों, अप्सराओं, चारणों, गुह्यकों तथा वसिष्ठ और अरुंधती के साथ कुशस्थली (द्वारका) आ पहुँचे। उधर अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने भी सुभद्रा और अर्जुन की मनोदशा को समझ लिया। उन्होंने बलराम (रौहिणेय—जो उस समय निद्रा या अन्य अवस्था में थे) को छोड़कर, अक्रूर, शिनिपुत्र सात्यकि, गद, वसुदेव, देवकी और बुद्धिमान उग्रसेन आदि स्वजनों के साथ रात में ही द्वारका नगरी में प्रवेश किया। महायशस्वी श्रीकृष्ण ने देवरूप में आए हुए नारद आदि महर्षियों तथा देवराज इंद्र का सत्कार किया। कुशल-क्षेम पूछने के बाद जब देवेन्द्र इंद्र ने विवाह की क्रिया संपन्न करने का अनुरोध किया, तो श्रीकृष्ण ने "तथास्तु" (स्वीकार है) कहा। तब उग्रसेन (आहुक), वसुदेव, अक्रूर और सात्यकि ने मस्तक झुकाकर देवराज इंद्र (पाकशासन) से कहा—"हे देवदेव, लोकनाथ, जगत्पते! आपको नमस्कार है। हे प्रभो! आपके वचनों से हम सब सगे-सम्बन्धियों सहित धन्य हो गए हैं और आप द्वारा अनुगृहीत हुए हैं।"

व्याख्या: जब अर्जुन और सुभद्रा धर्मसंकट और प्रेम की व्याकुलता में थे, तब देवराज इंद्र, महर्षि नारद, वसिष्ठ-अरुंधती और स्वयं श्रीकृष्ण ने इस विवाह को केवल गंधर्व विवाह तक सीमित न रखकर एक भव्य और दिव्य रूप देने का निर्णय किया। देवराज इंद्र और स्वयं द्वारका के वरिष्ठ जन इस दिव्य विवाह के आयोजन के लिए उपस्थित हो गए।

श्लोक 31 - 43

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा प्रसाद्यैनं पूजयित्वा प्रयत्नतः। महेन्द्रशासनात्सर्वे सहिता ऋषिभिस्तदा।। 31 ।। विवाहं कारयामासुः शक्रपुत्रस्य शास्त्रतः। अरुन्धती शची देवी रुग्मिणी देवकी तथा।। 32 ।। दिव्यस्त्रीभिश्च सहिताः सुभद्रायाः शुभाः क्रियाः। अर्जुनेऽपि तथा सर्वाः क्रिया भद्राः प्रयोजयन्।। 33 ।। महर्षिः काश्यपो होता सदस्या नारदादयः। पुण्याशिषः प्रयोक्तारः सर्वे ते हि तदार्जुने।। 34 ।। अभिषेकं तदा कृत्वा महेन्द्रः पाकशासनिम्। लोकपालैस्तु सहितः सर्वदेवैरभिष्टुतः।। 35 ।। किरीटाङ्गदहाराद्यैर्हस्ताभरणकुण्डलैः। भूषयित्वा तदा पार्थं द्वितीयमिव वासवम्।। 36 ।। पुत्रं परिष्वज्य तदा प्रीतिमाप पुरन्दरः। शछी देवी तदा भद्रामरुन्धत्यादिभिस्तथा।। 37 ।। कारयामास वैवाह्यमङ्गलान्यादवस्त्रियः। सहाप्सरोभिर्मुदिता भूषयित्वा स्वभूषणैः।। 38 ।। पौलोमीमिव मन्यन्ते सुभद्रां तत्र योषितः। ततो विवाहो ववृधे कृतः सर्वगुणान्वितः।। 39 ।। तस्याः पाणिं गृहीत्वा तु मन्त्रैर्होमपुरस्कृतम्। सुभद्रया बभौ जिष्णुः शच्या इव शचीपतिः।। 40 ।। सा जिष्णुमधिकं भेजे सुभद्रा चारुदर्शना। पार्थस्य सदृशी भद्रा रूपेण वयसा तथा।। 41 ।। सुभद्रायाश्च पार्थोऽपि सदृशो रूपलक्षणैः। इत्यूचुश्च तदा देवाः प्रीताः सेन्द्रपुरोगमाः।। 42 ।। एवं निवेश्य देवास्ते गन्धर्वैः साप्सरोगणैः। आमन्त्र्य यादवाः सर्वे विप्रजग्मुर्यथागतम्।। 43 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—इन्द्र को प्रसन्न कर और उनकी पूजा करके, देवराज इन्द्र की आज्ञा से ऋषियों सहित सभी ने शास्त्रोक्त विधि से इंद्रपुत्र अर्जुन (पार्थ) का विवाह संपन्न कराया। अरुंधती, शची देवी, रुक्मिणी, देवकी और अन्य दिव्य स्त्रियों ने तथा यादव स्त्रियों ने सुभद्रा के सभी मंगल संस्कार और विवाह की शुभ क्रियाएँ पूर्ण कराईं। इस विवाह में महर्षि काश्यप होता (हवनकर्ता) बने और नारद आदि महर्षिगण सदस्य तथा पुण्याशीर्वाद देने वाले बने। देवेन्द्र इंद्र ने लोकपालों और सभी देवताओं के साथ स्तुति करते हुए अपने पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक/विवाह-संस्कार संपन्न कराया। किरीट, अंगद, हार, कंगन और कुण्डलों से सुसज्जित होकर पार्थ दूसरे इन्द्र (वासव) के समान शोभायमान हो रहे थे। पुरंदर (इंद्र) ने अपने पुत्र अर्जुन को गले लगाकर अपार प्रसन्नता प्राप्त की। शची देवी ने अरुंधती आदि तथा यादव स्त्रियों और अप्सराओं के साथ मिलकर सुभद्रा को अपने आभूषणों से सजाया और वैवाहिक मंगल कार्य संपन्न किए। वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ सुभद्रा को इन्द्राणी (पौलोमी) के समान मान रही थीं। इस प्रकार समस्त गुणों से संपन्न यह भव्य विवाह संपन्न हुआ। मंत्रोच्चार और हवन के साथ जिष्णु (अर्जुन) ने सुभद्रा का पाणिग्रहण किया। वे दोनों ऐसे शोभा पा रहे थे जैसे शची के साथ शचीपति इंद्र सुशोभित होते हैं। सुंदर दर्शन वाली सुभद्रा रूप और आयु में अर्जुन के बिल्कुल अनुकूल थीं और अर्जुन भी रूप-लक्षणों में सुभद्रा के पूर्ण सदृश थे—इंद्र सहित सभी देवताओं ने प्रसन्न होकर ऐसा ही कहा। इस प्रकार देवताओं, गंधर्वों और अप्सराओं के साथ विवाह संपन्न कराकर सभी यादव और देवता यथारस्थान विदा हुए।

व्याख्या इन श्लोकों की: जो विवाह पहले केवल गंधर्व विवाह के रूप में होना तय था, उसे देवराज इंद्र, महर्षि काश्यप, नारद, वसिष्ठ-अरुंधती और श्रीकृष्ण की उपस्थिति ने एक अत्यंत भव्य, दिव्य और शास्त्रसम्मत महाविवाह में बदल दिया। स्वयं इंद्र ने अपने पुत्र अर्जुन का अभिनंदन किया और शची तथा यादव रानियों ने सुभद्रा का श्रृंगार कर विवाह की सभी वैदिक और लौकिक रीतियाँ पूरी कराईं।

श्लोक 44 - 52

यादवाः पार्थमामन्त्र्य अन्तर्द्वीपं गतास्तदा। वासुदेवस्तदा पार्थमुवाच यदुनन्दनः।। 44 ।। द्वाविंशद्दिवसान्पार्थ इहोष्य भरतर्षभ। मामकं रथमारुह्य शैब्यसुग्रीवयोजितम्।। 45 ।। सुभद्रया सुखं पार्थ खाण्डवप्रस्थमाविश। यादवैः सहितः पश्चादागमिष्यामि भारत। यतिवेषेण नियतो वस त्वं रुक्मिणीगृहे।। 46 ।। वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा प्रचक्राम अन्तर्द्वीपं जनार्दनः। कृतोद्वाहस्ततः पार्थः कृतकार्योऽभवत्तदा।। 47 ।। तस्यां चोपगतो भावः पार्थस्य सुमहात्मनः। तस्मिन्भावः सुभद्राया अन्योन्यं समवर्धत।। 48 ।। स तथा युयुजे वीरो भद्रया भरतर्षभः। अभिनिष्पन्नया रामः सीतयेव समन्वितः।। 49 ।। अपि जिष्णुर्विजज्ञे तां ह्रीं श्रियं सन्नतिक्रियाम्। देवतानां वरस्त्रीणां रूपेण सदृशीं सतीं च।। 50 ।। स प्रकृत्या श्रिया दीप्त्या संदिदीपे तयाऽधिकम्। उद्यत्सहस्रदीप्तांशुः शरदीव दिवाकरः।। 51 ।। सा तु तं मनुजव्याघ्रमनुरक्ता यशस्विनी। कन्यापुरगता भूत्वा तत्परा समपद्यत।। 52 ।।

अनुवाद: यादवगण अर्जुन से विदा लेकर वापस अंतर्द्वीप चले गए। तब यदुनंदन वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने अर्जुन से कहा—"हे भरतश्रेष्ठ पार्थ! यहाँ बाईस दिन और निवास करो। इसके बाद मेरे शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर, सुभद्रा के साथ सुखपूर्वक खांडवप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) जाओ। मैं बाद में यादवों के साथ आऊँगा। तब तक तुम नियमानुसार रुक्मिणी के भवन में यति के वेश में ही निवास करो।" वैशम्पायन जी कहते हैं—ऐसा कहकर जनार्दन श्रीकृष्ण अंतर्द्वीप की ओर प्रस्थान कर गए। तब विवाह संपन्न होने पर अर्जुन का कार्य सिद्ध हो गया। उन महात्मा अर्जुन का प्रेम सुभद्रा के प्रति और सुभद्रा का प्रेम अर्जुन के प्रति दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ने लगा। भरतश्रेष्ठ वीर अर्जुन सुभद्रा के साथ ऐसे सुशोभित हुए, जैसे वन में रामजी सीता के साथ सुशोभित हुए थे। जिष्णु (अर्जुन) उस सती सुभद्रा को लज्जा, श्री और उत्तम संस्कारों से युक्त तथा देव-स्त्रियों के समान सुंदर रूप वाली मानते थे। वे अपनी स्वाभाविक कांति और उस दीप्ति के साथ ऐसे प्रकाशमान हुए, जैसे शरद ऋतु में हजारों किरणों से दीप्त सूर्य चमकता हो। वह यशस्विनी कन्या सुभद्रा भी उन मनुष्यश्रेष्ठ अर्जुन के प्रति पूर्णतः अनुरक्ता होकर कन्यापुर में उन्हीं की सेवा और ध्यान में लीन हो गईं।

व्याख्या: विवाह के उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि वे अभी कुछ दिन और यति वेश में रुक्मिणी के भवन में रहें, और फिर उचित समय पर सुभद्रा को रथ पर बैठाकर इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करें। अंत में कवि अर्जुन और सुभद्रा की जोड़ी की तुलना भगवान राम और माता सीता से करते हुए उनके गाढ़ प्रेम का सुंदर अंत करते हैं।

(इस प्रकार महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरण पर्व का यह 242वाँ अध्याय पूर्ण होता है।)

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