महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४३

महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४३

महाभारत के आदिपर्व (सुभद्राहरण पर्व) के इस 243वें अध्याय में अर्जुन और सुभद्रा के द्वारका से इंद्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करने तथा सुभद्राहरण के मुख्य घटनाक्रम का वर्णन है। सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत व्याख्या नीचे दी जा रही है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 7

वैशंपायन उवाच। कुकुरान्धकवृष्णीनामपयानं च पाण्डवः। विनिश्चित्य ततः पार्थः सुभद्रामिदमब्रवीत्।। 1 ।। द्विजानां गुणमुख्यानां यथार्हं प्रतिपादय। भोज्यैर्भक्ष्यैश्च कामैश्च स्वपुरीं प्रतियास्यताम्।। 2 ।। आत्मनश्च समुद्दिश्य महाव्रतसमापनम्। गच्छ भद्रे स्वयं तूर्णं महाराजनिवेशनम्।। 3 ।। तेजोबलजवोपेतैः शुक्लैर्हयवरोत्तमैः। वाजिभिः शैव्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः।। 4 ।। युक्तं रथवरं तूर्णमिहानय सुसत्कृतम्। व्रतार्थमिति भाषित्वा सखीभिः सुभगे सह।। 5 ।। क्षिप्रमादाय पर्येहि सह सर्वायुधेन च। अनुकर्षान्तपताकाश्च तूणीरांश्च धनूंषि च।। 6 ।। सर्वान्रथवरे स्थाप्य सोत्सेधाश्च महागदाः।। 7 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—द्वारका से यादवों (कुकुर, अंधक और वृष्णि वंशियों) के उत्सव के लिए द्वीप पर चले जाने का निश्चय करके अर्जुन ने सुभद्रा से कहा—"हे भद्रे! अपनी पुरी लौट रहे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उनकी योग्यता के अनुसार भक्ष्य, भोज्य और इच्छित वस्तुएँ देकर उनका सत्कार करो। फिर अपने महाव्रत के समापन का बहाना बनाकर शीघ्र महाराज (वसुदेव/उग्रसेन) के भवन में जाओ। वहाँ अपनी सखियों से कहना कि व्रत की पूर्ति के लिए रथ चाहिए। इस प्रकार शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक श्रेष्ठ श्वेत घोड़ों से जुते, तेज और बल से संपन्न श्रीकृष्ण के उत्तम रथ को ले आओ। साथ ही धनुष, बाणों से भरे त्रोण (तूणीर), पताकाएँ और विशाल गदाओं सहित सभी अस्त्र-शस्त्रों को रथ पर रखकर शीघ्र यहाँ आ जाओ।"

व्याख्या: अर्जुन ने अब द्वारका से प्रस्थान करने का समय उपयुक्त समझा। उन्होंने सुभद्रा को एक चतुर योजना बताई जिसके तहत ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी जाए और व्रत-समापन के बहाने श्रीकृष्ण के दिव्य रथ तथा अर्जुन के सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को रथ पर लादकर ले आया जाए।

श्लोक 8 - 13

वैशंपायन उवाच। अर्जुनेनैवमुक्ता सा सुभद्रा भद्रभाषिणी। जगाम नृपतेर्वेश्म सखीभिः सहिता तदा।। 8 ।। व्रतार्थमिति तत्रस्थान्रक्षिणो वाक्यमब्रवीत्। रथेनानेन यास्यामि महाव्रतसमापनम्।। 9 ।। शैब्यसुग्रीवयुक्तेन सायुधेनैव शार्ङ्गिणः। रथेन रमणीयेन प्रयास्यामि व्रतार्थिनी।। 10 ।। सुभध्रयैवमुक्ते तु जनाः प्राञ्जलयोऽभवन्। योजयित्वा रथवरं कल्याणैरभिभाष्य ताम्।। 11 ।। यथोक्तं सर्वमारोप्य आयुधानि च भामिनी। क्षिप्रमादाय कल्याणी सुभद्राऽर्जुनमब्रवीत्।। 12 ।। रथोऽयं रथिनां श्रेष्ठ आनीतस्तव शासनात्। स त्वं याहि यथाकामं कुरून्कौरवनन्दन।। 13 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—अर्जुन के ऐसा कहने पर मधुरभाषिणी सुभद्रा अपनी सखियों के साथ राजभवन गईं। उन्होंने वहाँ तैनात रक्षकों से कहा—"अपने महाव्रत की पूर्णाहुति के लिए मैं श्रीकृष्ण के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त तथा शैब्य और सुग्रीव आदि घोड़ों से जुते सुंदर रथ पर बैठकर जाना चाहती हूँ।" सुभद्रा के ऐसा कहने पर रक्षकों ने हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और रथ तैयार कर दिया। कल्याणी सुभद्रा अर्जुन के कहे अनुसार सभी अस्त्र-शस्त्र रथ पर रखकर शीघ्रता से अर्जुन के पास आईं और बोलीं—"हे रथि श्रेष्ठ कौरवनंदन! आपकी आज्ञानुसार रथ आ गया है। अब आप अपनी इच्छानुसार कुरु देश (इंद्रप्रस्थ) के लिए प्रस्थान करें।"

व्याख्या: सुभद्रा ने अपनी बुद्धि और तत्परता से राजभवन के रक्षकों से श्रीकृष्ण का अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रथ प्राप्त कर लिया और अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

श्लोक 14 - 20

वैशंपायन उवाच। निवेद्य तु रथं भर्तुः सुभद्रा भद्रसंमता। ब्राह्मणानां तदा हृष्टा ददौ सा विविधं वसु।। 14 ।। स्नेहवन्ति च भोज्यानि प्रददावीप्सितानि च। यथाकामं यथाश्रद्धं वस्त्राणि विविधानि च।। 15 ।। तर्पिता विविधैर्भोज्यैस्तान्यवाप्य वसूनि च। ब्राह्मणाः स्वगृहं जग्मुः प्रयुज्य परमाशिषः।। 16 ।। सुभद्रया तु विज्ञप्तः पूर्वमेव धनञ्जयः। अभीशुग्रहणे पार्थ न मेऽस्ति सदृशो भुवि।। 17 ।। तस्मात्सा पूर्वमारुह्य रश्मीञ्जग्राह माधवी। सोदरा वासुदेवस्य कृतस्वस्त्ययना हयान्।। 18 ।। व्यत्ययित्वा तु तल्लिङ्गं यतिवेषं धनञ्जयः। आमुच्य कवचं वीरः समुच्छ्रितमहद्धनुः।। 19 ।। आरुरोह रथश्रेष्ठं शुक्लवासा धनञ्जयः। महेन्द्रदत्तं मुकुटं तथैवाभरणानि च।। 20 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—पति (अर्जुन) को रथ सौंपकर प्रसन्नचित्त सुभद्रा ने ब्राह्मणों को विविध प्रकार का धन, स्वादिष्ट भोजन, स्निग्ध पदार्थ और उनकी इच्छा एवं श्रद्धा के अनुसार वस्त्र प्रदान किए। मनचाहा भोजन और धन-दक्षिणा पाकर संतुष्ट हुए ब्राह्मणों ने उत्तम आशीर्वाद देते हुए अपने-अपने घर के लिए प्रस्थान किया। सुभद्रा ने पहले ही अर्जुन से कहा था—"हे पार्थ! पृथ्वी पर रथ की रास (लगाम) सँभालने में मेरे समान कोई कुशल नहीं है।" इसलिए श्रीकृष्ण की सगी बहन सुभद्रा ने स्वयं पहले रथ पर चढ़कर घोड़ों की लगाम थाम ली। उधर वीर अर्जुन ने संन्यासी (यति) का वेश त्याग दिया, कवच धारण किया, अपना विशाल धनुष उठाया, तथा देवराज इंद्र द्वारा दिए गए किरीट (मुकुट) और आभूषणों से सुसज्जित होकर श्वेत वस्त्र धारण किए हुए उस श्रेष्ठ रथ पर सवार हुए।

व्याख्या: यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक दृश्य का वर्णन है—सुभद्रा स्वयं सारथी का पद सँभालती हैं और लगाम अपने हाथों में लेती हैं। अर्जुन अपने संन्यासी वेश को त्यागकर अपने वास्तविक क्षत्रिय और महारथी रूप में प्रकट होते हैं।

श्लोक 21 - 26

अलङ्कृत्य तु कौन्तेयः प्रयातुमुपचक्रमे। ततः कन्यापुरे घोषस्तुमुलः समपद्यत।। 21 ।। दृष्ट्वा नववरं पार्थं बाणखड्गधनुर्धरम्। अभीशुहस्तां सुश्रोणीमर्जुनेन रथे स्थिताम्।। 22 ।। ऊचुः कन्यास्तदा यान्तीं वासुदेवसहोदराम्। सर्वकामसमृद्धा त्वं सुभद्रे भद्रभाषिणि।। 23 ।। वासुदेवप्रियं लब्ध्वा भर्तारं वीरमर्जुनम्। सर्वसीमन्तिनीनां त्वां श्रेष्ठां कृष्णसहोदरीम्।। 24 ।। मन्यामहे महाभागे सुभद्रे भद्रभाषिणि। यस्मात्सर्वमनुष्याणां श्रेष्ठो भर्ता तवार्जुनः।। 25 ।। उपपन्नस्त्वया वीरः सर्वलोकमहारथः। हे प्रयाहि गृहान्भद्रे सुहृद्भिः संगमोऽस्तु ते।। 26 ।।

अनुवाद: आभूषणों से सुसज्जित होकर कौन्तेय अर्जुन जब जाने के लिए उद्यत हुए, तब अंतःपुर (कन्यापुर) में भारी कोलाहल मच गया। बाण, खड्ग और धनुष धारण किए हुए नए वर अर्जुन को और हाथों में लगाम लिए सुंदर सुभद्रा को उनके साथ रथ में स्थित देखकर अंतःपुर की कन्याएँ श्रीकृष्ण की बहन से कहने लगीं—"हे सुभद्रा! तुम सर्वथा समर्थ और सौभाग्यवती हो। श्रीकृष्ण के प्रिय और परम वीर अर्जुन को पति रूप में पाकर हम तुम्हें समस्त नारियों में श्रेष्ठ मानती हैं। समस्त मनुष्यों में श्रेष्ठ अर्जुन तुम्हारे पति बने हैं और यह सर्वलोक-प्रसिद्ध महारथी वीर तुम्हें प्राप्त हुआ है। हे कल्याणी! तुम अपने नए घर जाओ, अपने बंधु-बांधवों से तुम्हारा सुखद मिलन हो।"

व्याख्या: अंतःपुर की स्त्रियाँ और सखियाँ अर्जुन और सुभद्रा की इस जोड़ी को देखकर अत्यंत हर्षित होती हैं। वे सुभद्रा के सौभाग्य की सराहना करती हैं और उन्हें इंद्रप्रस्थ जाने के लिए मंगलकामनाएँ एवं आशीर्वाद देती हैं।

श्लोक 27 - 32

वैशंपायन उवाच। एवमुक्ता प्रहृष्टाभिः सखीभिः प्रतिनन्दिता। भद्रा भद्रजवोपेतानश्वान्पुनरचोदयत्।। 27 ।। पार्श्वे चामरहस्ता सा सखी तस्याङ्गनाऽभवत्। ततः कन्यापुरद्वारात्सघोषादभिनिःसृतम्।। 28 ।। ददृशुस्तं रथश्रेष्ठं जना जीमूतनिस्वनम्। सुभद्रासङ्गृहीतस्य रथस्य महतः स्वनम्।। 29 ।। मेघस्वनमिवाकाशे शुश्रुवुः पुरवासिनः। सुभद्रया तु संपन्ने तिष्ठन्रथवरेऽर्जुनः।। 30 ।। प्रबभौ च तयोपेतः कैलास इव गङ्गया। पार्थः सुभद्रासहितो विरराज महारथः।। 31 ।। विराजते यथा शक्रो राजञ्शच्या समन्वितः।। 32 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—प्रसन्नचित्त सखियों द्वारा इस प्रकार बधाई दी जाने पर सुभद्रा ने तेज गति वाले घोड़ों को आगे बढ़ाया। एक सखी पार्श्व में हाथ में चँवर लेकर खड़ी थी। जब मेघों के समान गंभीर गर्जना करता हुआ वह श्रेष्ठ रथ अंतःपुर के मुख्य द्वार से निकला, तो नगरवासियों ने उसे देखा। सुभद्रा द्वारा चलाए जा रहे उस महान रथ की घड़घड़ाहट आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट जैसी सुनाई दे रही थी। सुभद्रा के साथ रथ पर खड़े अर्जुन ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे गंगा जी के साथ कैलाश पर्वत शोभा पाता है। महारथी पार्थ सुभद्रा के साथ वैसे ही सुशोभित थे जैसे अपनी पत्नी शची के साथ देवराज इंद्र सुशोभित होते हैं।

व्याख्या: रथ के प्रस्थान का यह बहुत ही भव्य और ओजस्वी वर्णन है। सुभद्रा द्वारा संचालित रथ का शब्द मेघगर्जन के समान था और रथारूढ़ अर्जुन-सुभद्रा की तुलना कैलाश-गंगा तथा इंद्र-शची से की गई है।

श्लोक 33 - 38

सुभद्रां प्रेक्ष्य पार्थेन ह्रियमाणां यशस्विनीम्। चक्रुः किलकिलाशब्दानासाद्य बहवो जनाः। दाशार्हाणां कुलस्य श्रीः सुभद्रा मद्रभाषिणी।। 33 ।। अभिकामा सकामेन पार्थेन सह गच्छति। अथापरे तु संक्रुद्धा गृह्णीत घ्नत माचिरम्।। 34 ।। इति संवार्य शस्त्राणि ववर्षुरभितो दिशम्। इति संभाषमाणानां स नादः सुमहानभूत्।। 35 ।। स तेन जनघोषेण वीरो गज इवार्दितः। ववर्ष शरवर्षाणि न तु कंचन रोषयत्।। 36 ।। मुमोच निशितान्बाणान्दीप्यमानान्स्वतेजसा। प्रासादवरसङ्घेषु हर्म्येषु भवनेषु च।। 37 ।। क्षोभयित्वा पुरश्रेष्ठं गरुत्मानिव सागरम्। प्रेक्षन्रैवकतद्वारं निर्ययौ भरतर्षभः।। 38 ।।

अनुवाद: यशस्विनी सुभद्रा को अर्जुन द्वारा ले जाते देखकर बहुत से लोग पास आकर किलकारी मारने और जयकार करने लगे—"दशार्हकुल की लक्ष्मी मधुरभाषिणी सुभद्रा स्वयं अपनी इच्छा से कामासक्त पार्थ के साथ जा रही हैं।" परंतु नगर के कुछ अन्य रक्षक व द्वारपाल क्रोधित होकर चिल्लाने लगे—"इसे पकड़ो! मारो! देर मत करो!" ऐसा कहकर उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र सँभाले और चारों दिशाओं से अस्त्रों की वर्षा करने लगे। इस प्रकार शोर मचाते हुए सैनिकों का भारी कोलाहल हुआ। उस जन-कोलाहल से उत्तेजित होकर वीर अर्जुन ने बाणों की वर्षा आरंभ की, परंतु उन्होंने किसी को मृत्यु के घाट नहीं उतारा (क्रोधित नहीं किया)। उन्होंने अपने तेज से प्रकाशित होने वाले तीखे बाणों को राजमहलों, अट्टालिकाओं और भवनों पर छोड़कर (केवल डराने व रोकने हेतु) संपूर्ण द्वारकापुरी को वैसे ही विक्षुब्ध कर दिया जैसे गरुड़ समुद्र को विक्षुब्ध कर देते हैं। इस प्रकार भरतश्रेष्ठ अर्जुन रैवतक पर्वत के द्वार की ओर देखते हुए द्वारका नगरी से बाहर निकल गए।

व्याख्या: सुभद्राहरण के समय द्वारका में दो तरह की प्रतिक्रियाएँ हुईं—सामान्य जन तो जानते थे कि सुभद्रा अर्जुन से प्रेम करती हैं, अतः वे प्रसन्न थे; किंतु द्वारका के नगर रक्षक क्षत्रिय धर्मानुसार आक्रमणकारी समझकर अर्जुन पर टूट पड़े। अर्जुन ने अपने पराक्रम का परिचय दिया, किंतु यादवों से पारिवारिक संबंध होने के कारण किसी का वध किए बिना केवल अपने बाणों से उन्हें रोक दिया और सुरक्षित रूप से द्वारका से बाहर निकल गए।

(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरण पर्व का २४३वाँ अध्याय पूरा हुआ।)

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