महाभारत के आदिपर्व (सुभद्राहरण पर्व) के इस 244वें अध्याय में यादवी सेनापति विपृथु के साथ अर्जुन के युद्ध एवं संवाद, अर्जुन-सुभद्रा के प्रस्थान, तथा द्वारका में सुधर्मा सभा के भीतर बलराम जी (हलायुध) एवं वृष्णिवीरों के प्रचंड क्रोध का वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 5
वैशंपायन उवाच। शासनात्पुरुषेन्द्रस्य बलेन महता बली। गिरौ रैवतके नित्यं बभूव विपृथुश्रवाः।। 1 ।। प्रवासे वासुदेवस्य तस्मिन्हलधरोपमः। संबभूव तदा गोप्ता पुरस्य पुरवर्धनः।। 2 ।। प्राप्य पाण्डवनिर्याणं निर्ययौ विपृथुश्रवाः। निशम्य पुरनिर्घोषं स्वमनीकमचोदयत्।। 3 ।। सोऽभिपत्य तदाध्वानं ददर्श पुरुषर्षभम्। निःसृतं द्वारकाद्वारादंशुमन्तमिवाम्बिरात्।। 4 ।। सविद्युतमिवाम्भोदं प्रेक्षतां तं धनुर्धरम्। पार्थमानर्तयोधानां विस्मयः समपद्यत।। 5 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—पुरुष श्रेष्ठ श्रीकृष्ण की आज्ञा से महान बलिष्ठ 'विपृथु' (विपृथुश्रवा) अपनी विशाल सेना के साथ रैवतक पर्वत पर सदा तैनात रहते थे। श्रीकृष्ण के प्रवास (द्वीप-यात्रा) के समय बलराम जी के समान पराक्रमी विपृथु ही उस नगरी की रक्षा करने वाले रक्षक थे। नगर में भारी कोलाहल सुनकर और पांडव अर्जुन के निकलने की सूचना पाकर विपृथु अपनी सेना लेकर निकले। मार्ग में तेजी से पहुँचकर उन्होंने द्वारका के द्वार से बाहर निकले पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन को ऐसे देखा जैसे आकाश से सूर्य निकल रहा हो। बिजली से चमकते मेघ के समान उस धनुर्धर पार्थ को देखकर आनर्त (द्वारका/गुजरात) के योद्धाओं को बड़ा आश्चर्य हुआ।
व्याख्या: जब अर्जुन सुभद्रा को लेकर निकले, तब द्वारका के मुख्य संरक्षक विपृथु (जो श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में नगर के रक्षक थे) अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ मार्ग में आ खड़े हुए।
श्लोक 6 - 10
उदीर्णरथनागाश्वमनीकमभिवीक्ष्य तत्। उवाच परमप्रीता सुभद्रा भद्रभाषिणी।। 6 ।। संग्रहीतुमभिप्रायो दीर्घकालकृतो मम। युध्यमानस्य सङ्ग्रामे रथं तव नरर्षभ।। 7 ।। ओजस्तेजोद्युतिबलैरन्वितस्य महात्मनः। पार्थ ते सारथित्वेन भविता शिक्षितास्म्यहम्।। 8 ।। एवमुक्तः प्रियां प्रीतः प्रत्युवाच नरर्षभः। चोदयाश्वानसंसक्तान्विश्तु विपृथोर्बलम्।। 9 ।। बहुभिर्युध्यमानस्य तावकान्विजिघांसतः। पश्य बाहुबलं भद्रे शरान्विक्षिपतो मम।। 10 ।।
अनुवाद: रथ, हाथी और घोड़ों से सुसज्जित उस उग्र सेना को देखकर मधुरभाषिणी सुभद्रा अत्यंत प्रसन्न होकर बोलीं—"हे पुरुषश्रेष्ठ! युद्ध में संग्राम करते समय आपके रथ की बागडोर सँभालने (सारथी बनने) की मेरी दीर्घकाल से अभिलाषा थी। हे ओज, तेज, कांति और बल से संपन्न महात्मा पार्थ! आपके सारथी के रूप में मैं भली-भांति प्रशिक्षित हूँ।" सुभद्रा के ऐसे वचन सुनकर श्रेष्ठ पुरुष अर्जुन ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया—"हे प्रिये! तुम बिना रुके घोड़ों को आगे बढ़ाओ और विपृथु की सेना में प्रवेश कराओ। हे भद्रे! अनेक योद्धाओं से युद्ध करते हुए और तुम्हारे परिजनों (सैनिकों) को बिना मारे केवल बाणों की वर्षा करते हुए आज मेरा बाहुबल देखो।"
व्याख्या: सुभद्रा भयभीत होने के बजाय अत्यंत उत्साहित होकर अर्जुन से कहती हैं कि वे एक कुशल सारथी हैं और युद्ध में अर्जुन का रथ हाँकेंगी। अर्जुन भी अपनी प्रियतमा को आश्वस्त करते हैं कि वे यादव सैनिकों का वध किए बिना केवल उनके शस्त्र काटेंगे।
श्लोक 11 - 18
वैशंपायन उवाच। एवमुक्ता तदा भद्रा पार्थेन भरतर्षभ। चुचोद साश्वान्संहृष्टा ते ततो विविशुर्बलम्।। 11 ।। तदाहतमहावाद्यं समुदग्रध्वजायुतम्। अनीकं विपृथोर्हृष्टं पार्थमेवान्ववर्तत।। 12 ।। रथैर्बहुविधाकारैः सदश्वैश्च महाजवैः। किरन्तः शरवर्षाणि परिवव्रुर्धनञ्जयम्।। 13 ।। तेषामस्त्राणि संवार्य दिव्यास्त्रेण महास्त्रवित्। आवृणोन्महदाकाशं शरैः परपुरञ्जयः।। 14 ।। तेषाम बाणान्महाबाहुर्मुकुटान्यङ्गदानि च। चिच्छेद निशितैर्बाणैः शरांश्चैव धनूंषि च।। 15 ।। युगानीषान्वरूथानि यन्त्राणि विविधानि च। अजिघांसन्परान्पार्थश्चिच्छेद निशितैः शरैः।। 16 ।। विधनुष्कान्विकवचान्विरथांश्च महारथान्। कृत्वा पार्थः प्रियां प्रीतः प्रेक्ष्यतामित्यदर्शयत्।। 17 ।। सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सुभद्रा पार्थमब्रवीत्। अवाप्तार्थाऽस्मि भद्रं ते याहि पार्थ यथासुखम्।। 18 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—हे भरतश्रेष्ठ! अर्जुन के ऐसा कहने पर हर्षित सुभद्रा ने घोड़ों को हांका और रथ सेना में प्रविष्ट हो गया। विपृथु की विशाल सेना ने, जिसमें ढोल-नगाड़े बज रहे थे और ध्वज फहरा रहे थे, अर्जुन को घेर लिया। अनेक प्रकार के रथों और तीव्रगामी घोड़ों पर सवार सैनिकों ने अर्जुन पर बाणों की वर्षा कर दी। महान अस्त्रवेत्ता शत्रुदमन अर्जुन ने दिव्यास्त्रों से उनके अस्त्रों को काटकर आकाश को अपने बाणों से ढक दिया। महाबाहु अर्जुन ने किसी को मारे बिना (अजिघांसन्) तीखे बाणों से सैनिकों के मुकुट, बाजूबंद, धनुष, बाण, जूए, रथ के मुख्य अंग और उपकरण काट डाले। महारथियों को बिना धनुष, बिना कवच और बिना रथ का बनाकर प्रसन्न हुए पार्थ ने सुभद्रा से कहा—"देखो!" उस महान आश्चर्य (अर्जुन के अद्भुत बाणकौशल) को देखकर सुभद्रा अर्जुन से बोलीं—"मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ, आपका कल्याण हो! हे पार्थ! अब आप सुखपूर्वक आगे बढ़िए।"
व्याख्या: अर्जुन ने अपनी अद्भुत धनुर्विद्या का परिचय दिया। उन्होंने किसी भी यादव सैनिक की हत्या नहीं की, बल्कि केवल उनके रथों के पहियों, मुकुटों, धनुषों और बाणों को छिन्न-भिन्न कर उन्हें निहत्था बना दिया। सुभद्रा यह अद्भुत पराक्रम देखकर मुग्ध हो गईं।
श्लोक 19 - 30
स सक्तं पाण्डुपुत्रेण समीक्ष्य विपृथुर्बलम्। त्वरमाणोऽभिसंक्रम्य स्थीयतामित्यभाषत।। 19 ।। ततः सेनापतेर्वाक्यं नात्यवर्तन्त यादवाः। सागरे मारुतोद्धूता वेलामिव महोर्मयः।। 20 ।। ततो रथवरात्तूर्णमवरुह्य नरर्षभः। अभिगम्य नरव्याघ्रं प्रहृष्टः परिषस्वजे।। 21 ।। सोऽब्रवीत्पार्थमासाद्य दीर्घकालमिदं तव। निवासमभिजानामि शङ्खचक्रगदाधरात्।। 22 ।। न मेऽस्त्यविदितं किंचिद्यद्यदाचितं त्वया। सुभद्रार्थं प्रलोभेन प्रीतस्तव जनार्दनः।। 23 ।। प्राप्तस्य यतिलिङ्गेन वासितस्य धनञ्जय। बन्धुमानसि रामेण महेन्द्रावरजेन च।। 24 ।। मामेव च सदाकाङ्क्षी मन्त्रिणं मधुसूदनः। अन्तरेण सुभद्रां च त्वां च तात धनञ्जय।। 25 ।। इमं रथवरं दिव्यं सर्वशस्त्रसमन्वितम्। इदमेवानुयात्रं च निर्दिश्य गदपूर्वजः।। 26 ।। अन्तर्द्वीपं तदा वीर गतो वृष्णिसुखावहः। दीर्घकालावरुद्धं त्वां संप्राप्तं प्रियया सह।। 27 ।। पश्यन्तु भ्रातरः सर्वे वज्रपाणिमिवामराः। आयाते तु दशार्हाणामृषभे शार्ङ्गधन्वनि।। 28 ।। भद्रामनुगमिष्यन्ति रत्नानि च वसूनि च। अरिष्टं याहि पन्थानं सुखी भव धनञ्जय।। 29 ।। नष्टशोकैर्विशोकस्य सुहृद्भिः संगमोऽस्तु ते।। 30 ।।
अनुवाद: अपनी सेना को अर्जुन द्वारा इस प्रकार पराजित और रोके जाने पर सेनापति विपृथु ने शीघ्रता से आकर अपनी सेना से कहा—"रुक जाओ!" जैसे समुद्र की विशाल तरंगें तट (वेला) का उल्लंघन नहीं करतीं, वैसे ही यादवों ने अपने सेनापति की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। तब पुरुषश्रेष्ठ विपृथु रथ से उतरकर अर्जुन के पास आए और परम प्रसन्न होकर उन्हें गले लगाया। वे अर्जुन से बोले—"हे पार्थ! शंख-चक्र-गदाधारी श्रीकृष्ण के मुख से मुझे आपके यहाँ (यति वेश में) निवास करने का हाल दीर्घकाल से ज्ञात था। आपने सुभद्रा के लिए जो-जो चाहा, उसमें से कुछ भी मुझसे गुप्त नहीं था। जनार्दन श्रीकृष्ण आपके इस प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हैं। संन्यासी के वेश में आए हुए हे धनंजय! आप बलराम और श्रीकृष्ण के सम्बंधी हैं। श्रीकृष्ण सुभद्रा और आपके विषय में सदैव मुझे ही अपना गुप्त परामर्शदाता बनाते रहे हैं। वृष्णियों का सुख बढ़ाने वाले श्रीकृष्ण इस सर्वशस्त्रयुक्त दिव्य रथ और यात्रा की व्यवस्था का निर्देश देकर ही अंतर्द्वीप गए थे। हे वीर! जैसे देवता इंद्र को देखते हैं, वैसे ही आपके सभी भाई प्रियतमा सुभद्रा के साथ आपको देखें। जब शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण आएँगे, तब सुभद्रा के पीछे-पीछे बहुत सा धन और रत्न भी इंद्रप्रस्थ आ जाएँगे। हे धनंजय! आप निर्विघ्न मार्ग से जाएँ और सुखी हों। शोकमुक्त होकर अपने बंधु-बांधवों से आपका मिलन हो।"
व्याख्या: सेनापति विपृथु ने केवल औपचारिकता के लिए अपनी ड्यूटी निभाई थी। वे अर्जुन को पहचानते थे और श्रीकृष्ण की पूरी गुप्त योजना से भली-भांति परिचित थे। उन्होंने युद्ध रोक दिया, अर्जुन को गले लगाया और आशीर्वाद देकर सम्मानपूर्वक विदा किया।
श्लोक 31 - 35
वैशंपायन उवाच। ततो विपृथुमामन्त्र्य पार्थः प्रीतोऽभिवाद्य च। कृष्णस्य मतमास्थाय कृष्णस्य रथमास्थितः।। 31 ।। पूर्वमेव तु पार्थाय कृष्णेन विनियोजितम्। सर्वरत्नसुसंपूर्णं सर्वभोगसमन्वितम्।। 32 ।। रथेन काञ्चनाङ्गेन कल्पितेन यथाविधि। शैब्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना।। 33 ।। सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतरवनादिना। ज्वलनार्चिःप्रकाशेन द्विषतां हर्षनाशिना।। 34 ।। सन्नद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्। युक्तः सेनानुयात्रेण रथणारोप्य माधवीम्। रथेनाकाशगेनैव पययौ स्वपुरं प्रति।। 35 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—तदनन्तर पार्थ ने प्रसन्न होकर विपृथु का अभिवादन किया और उनसे विदा लेकर श्रीकृष्ण की सम्मति के अनुसार श्रीकृष्ण के ही रथ पर सवार हुए। वह रथ श्रीकृष्ण द्वारा पहले से ही अर्जुन के लिए सर्वप्रकार के रत्नों, भोगों, सुवर्ण के अंगों, घुँघरू की मालाओं, शैब्य और सुग्रीव घोड़ों, तथा समस्त अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित किया गया था। उसकी गड़गड़ाहट मेघ के समान थी और उसकी कांति अग्नि की लपटों जैसी थी। हाथ में दस्ताने (गोधाङ्गुलित्र) पहने, कवच और खड्ग धारण किए वीर अर्जुन श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा को रथ पर बैठाकर, सेना के साथ आकाश में चलने वाले-से उस दिव्य रथ द्वारा अपने नगर (इंद्रप्रस्थ) की ओर चल पड़े।
व्याख्या: विपृथु से विदा लेकर अर्जुन सुभद्रा के साथ श्रीकृष्ण के उस दिव्य स्वर्ण रथ में बैठकर द्रुत गति से इंद्रप्रस्थ की ओर रवाना हो गए।
श्लोक 36 - 42
ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः। विक्रोशन्तोऽद्रवन्सर्वे द्वारकामभितः पुरीम्।। 36 ।। ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम्। सभापालस्य तत्सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम्।। 37 ।। तेषां श्रुत्वा सभापालो भेरीं सान्नाहिकीं ततः। समाजघ्ने महाघोषां जाम्बूनदपरिष्कृताम्।। 38 ।। क्षुब्धास्तेनाथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा। अन्तर्द्वीपात्समुत्पेतुः सहसा सहितास्तदा। अन्नपानमपास्याथ समापेतुः समन्ततः।। 39 ।। तत्र जाम्बूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च। मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च।। 40 ।। भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः। सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः।। 41 ।। तेषां समुपविष्टानां देवानामिव सन्नये। आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः।। 42 ।।
अनुवाद: सुभद्रा का हरण होते देखकर सामान्य सैनिक चिल्लाते हुए द्वारकापुरी की ओर भागे। उन्होंने 'सुधर्मा' राजसभा में पहुँचकर सभापाल (सभा के अध्यक्ष/रक्षक) को अर्जुन के इस पराक्रम और सुभद्रा-हरण का सारा समाचार सुनाया। यह सुनकर सभापाल ने युद्ध के लिए बुलावा देने वाली सोने से जड़ी महाभयंकर 'सांनाहिकी' (युद्ध-भेरी) को बजाया। उस भयंकर नगाड़े के शब्द से क्षुब्ध होकर अंतर्द्वीप में उत्सव मना रहे भोज, वृष्णि और अंधक वंशी यादव भोजन और पान छोड़कर तुरंत दौड़े चले आए। वहाँ स्वर्ण, मणि और मूंगे से जड़े तथा सुलगती अग्नि की भांति चमकते सैकड़ों दिव्य सिंहासनों पर वृष्णि और अंधक वंश के महारथी वैसे ही विराजमान हुए जैसे देवसभा में देवता बैठते हैं। जब सब बैठ गए, तब सभापाल ने अपने अनुचरों के साथ अर्जुन के कार्य की पूरी सूचना दी।
व्याख्या: जब साधारण रक्षकों ने सुधर्मा सभा में जाकर खबर दी, तो युद्ध की भेरी बजाई गई। समुद्र के द्वीप पर उत्सव मना रहे सभी यादव वीर खाना-पीना छोड़कर तुरंत द्वारका की मुख्य सुधर्मा सभा में एकत्र हो गए।
श्लोक 43 - 51
तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः। अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहङ्कृताः।। 43 ।। योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च। धनूंषि च महार्हाणि कवचानि बृहन्ति च।। 44 ।। सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद्रथान्योजयतेति च। स्वयं च तुरगान्केचिदयुञ्जन्हेमभूषितान्।। 45 ।। रथेष्वानीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च। अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत्तुमुलं महत्।। 46 ।। वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः। नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत्।। 47 ।। किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने। अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः।। 48 ।। एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः। यदस्य रुचिरं कर्तुं तत्कुरुध्वमतन्द्रिताः।। 49 ।। ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा ग्राह्यरूपं हलायुधात्। तूष्णींभूतास्ततः सर्वे साधुसाध्विति चाब्रुवन्।। 50 ।। समं वचो निशम्यैव बलदेवस्य धीमतः। पुनरेवसभामध्ये सर्वे ते समुपाविशन्।। 51 ।।
अनुवाद: यह सुनकर मद और क्रोध से लाल आँखों वाले वृष्णिवीर अर्जुन के इस आचरण को सहन न करते हुए अहंकार से उछल पड़े। वे चिल्लाने लगे—"शीघ्र रथ जोतो! भाले, बहुमूल्य धनुष और विशाल कवच लाओ!" कुछ सूतों (सारथियों) को पुकारने लगे और कुछ स्वयं ही घोड़ों पर सोने के आभूषण सजाने लगे। रथों, कवचों और ध्वजों को लाने तथा वीरों के गर्जन से वहाँ भारी कोलाहल मच गया। तब कैलाश पर्वत के समान विशाल, नीले वस्त्र धारण किए हुए, वनमाला पहने तथा मदिरा के मद में स्थित हलायुध बलराम जी ने कहा—"तुम सब बिना बुद्धि के यह क्या कर रहे हो? जब श्रीकृष्ण शांत बैठे हैं, तो उनके मनोभाव को जाने बिना क्रोधित होकर व्यर्थ में क्यों गरज रहे हो? पहले इन महामति श्रीकृष्ण को अपना अभिप्राय बताने दो। इन्हें जो उचित लगे, तुम सब आलस्य छोड़कर वही करो।" बलराम जी के इस तर्कसंगत वचन को सुनकर सब शांत हो गए और "साधु! साधु!" (बहुत ठीक) कहने लगे। बुद्धिमान बलदेव के वचनों को सुनकर सभी यादव पुनः सभा में बैठ गए।
व्याख्या: अर्जुन द्वारा सुभद्रा का हरण किए जाने पर यादव वीर अत्यंत क्रुद्ध हो गए और तुरंत युद्ध की तैयारी करने लगे। परंतु बलराम जी ने सभी को रोका और कहा कि जब श्रीकृष्ण शांत बैठे हैं, तो पहले उनकी राय जानना आवश्यक है।
श्लोक 52 - 59
ततोऽब्रवीद्वासुदेवं वचो रामः परन्तपः। त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण भूतभव्यभविष्यकृत्। किमवागुपविष्टोऽसि प्रेक्षमाणो जनार्दन।। 52 ।। सत्कृतस्त्वत्कृते पार्थः सर्वैरस्माभिरच्युत। न च सोऽर्हति तां पूजां दुर्बुद्धिः कुलपांसनः।। 53 ।। को हि तत्रैव भुक्तावान्नं भाजनं भेत्तुमर्हति। मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित्।। 54 ।। इच्छन्नेव हि संबन्धं कृतं पूर्वं च मानयन्। को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत्।। 55 ।। सोऽवमन्य तथाऽस्माकमनादृत्य च केशवम्। प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः।। 56 ।। कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम। मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः।। 57 ।। अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुन्धराम्। न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः।। 58 ।। तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम्। अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा।। 59 ।।
अनुवाद: इसके बाद शत्रुओं को तपाने वाले बलराम जी ने वासुदेव श्रीकृष्ण से कहा—"हे त्रैलोक्यनाथ! हे भूत, भविष्य और वर्तमान के रचयिता कृष्ण! हे जनार्दन! तुम केवल देखते हुए मौन क्यों बैठे हो? हे अच्युत! तुम्हारे कारण ही हम सबने अर्जुन का इतना आदर-सत्कार किया था, परंतु वह दुर्बुद्धि और कुल कलंकित करने वाला उस पूजा के योग्य नहीं था। उच्च कुल में उत्पन्न कौन पुरुष जिस बर्तन में भोजन करता है, उसी को तोड़ता है? सम्बंध की इच्छा रखने वाला और पुराने सम्बंधों का सम्मान करने वाला कौन अभििलाषी व्यक्ति ऐसा दुस्साहस करता है? उसने हम सभी का अपमान करके और केशव (तुम्हारा) भी अनादर करके अपनी मृत्यु रूप सुभद्रा का बलपूर्वक हरण किया है। उसने मेरे सिर पर पैर रखा है, हे गोविंद! सर्प जैसे पैर का स्पर्श सहन नहीं करता, वैसे मैं इसे कैसे सहूँगा? आज मैं अकेला ही इस पूरी पृथ्वी को 'निष्कौरव' (कौरवहीन/पांडवहीन) कर दूँगा! अर्जुन का यह अपराध मेरे द्वारा सहने योग्य नहीं है।" मेघ और दुंदुभि के समान गरजते हुए बलराम जी के इस कथन का सभी भोज, वृष्णि और अंधक वंशी यादवों ने समर्थन किया।
व्याख्या: बलराम जी श्रीकृष्ण के सामने अपना भारी रोष प्रकट करते हैं। वे अर्जुन के इस कृत्य को विश्वासघात और अपमान मानते हैं। उनका मानना था कि जिस कुल ने अर्जुन को शरण दी और अतिथिसत्कार किया, उसी कुल की कन्या का इस प्रकार हरण करना घोर अपराध है। बलराम जी क्रुद्ध होकर पांडवों के विनाश तक की प्रतिज्ञा ले बैठते हैं और सभी यादव सैनिक उनके साथ युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरण पर्व का २४४वाँ अध्याय पूरा हुआ।)
