श्री पद्मपुराण
भूमिखण्ड
• वेनोपाख्यान
मातापितृतीर्थ-माहात्म्य
त्रिषष्टितमोऽध्यायः (अध्याय ६३)
सुकर्मोवाच
श्लोक १–२९ • शब्दार्थ,
भावार्थ एवं व्याख्या
अध्याय-परिचय
यह अध्याय श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड के अंतर्गत वेनोपाख्यान का तिरसठवाँ अध्याय
है। इसका विषय है माता-पिता की सेवा-रूप तीर्थ की महिमा। यहाँ वक्ता सुकर्मा हैं और
श्रोता विप्र पिप्पल; अध्याय के अंतिम श्लोकों में 'पिप्पल' और 'महाप्राज्ञ', 'महामते'
जैसे संबोधन इसी संवाद-शैली की पुष्टि करते हैं।
अध्याय दो भागों में बँटा है। पहले भाग में माता-पिता की सेवा का महत्व और उसका
फल बताया गया है—सेवा सब तीर्थों के समान, यज्ञ-दान-तप से भी बढ़कर, और मोक्ष तक पहुँचाने
वाली। दूसरे भाग में उस सेवा के त्याग का भयानक फल बताया गया है—वह फल योनि-परंपरा
और नरक-वर्णन के रूप में आता है। अंत में सुकर्मा अपने अनुभव, यदु-राजा और रुरु के
उदाहरण से बात को प्रमाणित करते हैं।
पाठ-संबंध में एक बात ध्यान देने योग्य है: यहाँ दिए गए मूल पाठ में कुछ स्थानों
पर श्लोकों का वाक्य-संबंध बीच में टूटकर अगले श्लोक में पूरा होता है (जैसे श्लोक
१–२, २–३, ६–७, १०–१२, २१–२२ तथा २७–२९)। यह मुद्रित संस्करणों में पाठ-क्रम के विचलन
के कारण होता है। नीचे प्रत्येक श्लोक का अर्थ देते समय अर्थ-संगति के अनुसार वाक्य
जोड़कर समझाया गया है, और जहाँ पंक्ति आगे जुड़ती है वहाँ स्पष्ट संकेत दिया गया है।
प्रत्येक श्लोक के नीचे तीन खंड हैं—शब्दार्थ (पदों का अर्थ), भावार्थ (श्लोक
का सीधा आशय) और व्याख्या (भाव का विस्तार और संदर्भ)।
श्लोक १
तयोश्चापि द्विजश्रेष्ठ मातापित्रोश्च स्नातयोः ।
पुत्रस्यापि हि सर्वांगे पतंत्यंबुकणा यदा ॥१॥
शब्दार्थ — द्विजश्रेष्ठ — हे द्विजश्रेष्ठ (पिप्पल)!;
तयोः च अपि — उन दोनों का भी; मातापित्रोः — माता और पिता के; स्नातयोः — स्नान करते
समय (द्विवचन); पुत्रस्य अपि हि — पुत्र के भी; सर्वांगे — सब अंगों पर; पतन्ति — गिरती
हैं; अंबुकणाः — जल की बूँदें; यदा — जब।
भावार्थ — हे द्विजश्रेष्ठ! जब माता-पिता स्नान करते
हैं और उनके शरीर से जल की बूँदें पुत्र के सब अंगों पर गिरती हैं, उसी क्षण—
व्याख्या — अध्याय का आरंभ ही एक सुंदर प्रतिमा से
होता है। स्नान करते माता-पिता के अंगों से छूटकर पुत्र के शरीर पर पड़ने वाली जल-बूँद
को कवि तीर्थ-जल कहता है। यहाँ बल शरीर पर नहीं, संबंध पर है—पुत्र का शरीर उसी जल
से सिंचित होता है जो माता-पिता के देह से निकला है, अर्थात् वह उनका ही अंश है। इसलिए
'स्नान' शब्द आगे साधारण स्नान न रहकर तीर्थ-स्नान का पर्याय बन जाता है। वाक्य उत्तरार्ध
में पूरा होता है, जो अगले श्लोक में जाकर समाप्त होता है।
श्लोक २
सर्वतीर्थसमं स्नानं पुत्रस्यापि सुजायते ।
पतितं विकलं वृद्धमशक्तं सर्वकर्मसु ॥२॥
शब्दार्थ — सर्वतीर्थसमम् — सब तीर्थों के समान;
स्नानम् — स्नान; पुत्रस्य अपि — पुत्र का भी; सुजायते — भलीभाँति हो जाता है; पतितम्
— (समाज में) गिरे हुए, दीन; विकलम् — विकल, अंग-भंग वाले; वृद्धम् — वृद्ध; अशक्तम्
— असमर्थ; सर्वकर्मसु — सब कर्मों में।
भावार्थ — पहली पंक्ति पिछले श्लोक का वाक्य पूरा
करती है—तब पुत्र का वह स्नान सब तीर्थों के स्नान के समान फल देने वाला हो जाता है।
दूसरी पंक्ति से नया वाक्य आरंभ होता है, जो अगले श्लोक में पूरा होगा—जो पुत्र सब
कर्मों में असमर्थ, विकल, वृद्ध और पतित—
व्याख्या — 'सर्वतीर्थसमम्' कहकर शास्त्र माता-पिता
के आशीर्वाद-जल को गंगा, यमुना, गोदावरी आदि सब तीर्थों के बराबर रख देता है। कारण
स्पष्ट है—तीर्थ में जाकर मनुष्य पवित्रता चाहता है, और यहाँ पवित्रता घर में ही, बिना
यात्रा, बिना व्यय, बिना किसी यातना के उपलब्ध है। उत्तरार्ध से सेवा के पात्रों का
वर्णन आरंभ होता है, जिसमें पहला विशेषण 'पतित' है—अर्थात् वे माता-पिता जो जीवन में
किसी कारण से गिर गए हों, दीन हों, समाज की दृष्टि में उपेक्षित हों। शास्त्र उन्हें
त्याज्य नहीं, सेव्य कहता है।
श्लोक ३
व्याधितं कुष्ठिनं तातं मातरं च तथाविधाम् ।
उपाचरति यः पुत्रस्तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३॥
शब्दार्थ — व्याधितम् — रोगग्रस्त; कुष्ठिनम् — कुष्ठरोग
से पीड़ित; तातम् — पिता को; मातरम् — माता को; तथा-विधाम् — उसी प्रकार की (रोगिणी);
उपाचरति — सेवा-शुश्रूषा और उपचार करता है; यः पुत्रः — जो पुत्र; तस्य — उसका; पुण्यम्
— पुण्य; वदामि अहम् — मैं कहता हूँ।
भावार्थ — जो पुत्र रोगी और कुष्ठरोगी पिता तथा उसी
प्रकार रोगिणी माता की सेवा-शुश्रूषा करता है, उसके पुण्य का वर्णन मैं (सुकर्मा) करता
हूँ।
व्याख्या — पिछले श्लोक के विशेषणों की सूची यहाँ
पूरी होती है—पतित, विकल, वृद्ध, सर्वकर्मासमर्थ, व्याधित और कुष्ठी। ध्यान दें कि
सेवा तभी कठिन नहीं होती जब माता-पिता स्वस्थ और समर्थ हों; असली परीक्षा तब है जब
रोग, जीर्णता और असहायता उन्हें घेर लेती है—विशेषकर कुष्ठ जैसे रोग में, जिससे लोग
घृणा और भय के कारण दूर हट जाते हैं। शास्त्र ठीक उसी घड़ी की सेवा को 'पुण्य' कहता
है। 'वदाम्यहम्' कहकर सुकर्मा अपने अनुभव की साक्षी देते हैं, केवल उपदेश नहीं देते।
श्लोक ४
विष्णुस्तस्य प्रसन्नात्मा जायते नात्र संशयः ।
प्रयाति वैष्णवं लोकं यदप्राप्यं हि योगिभिः ॥४॥
शब्दार्थ — विष्णुः — भगवान विष्णु; तस्य — उस (सेवक
पुत्र) पर; प्रसन्नात्मा — प्रसन्नचित्त; जायते — होते हैं; न अत्र संशयः — इसमें संशय
नहीं; प्रयाति — वह जाता है; वैष्णवम् लोकम् — विष्णुलोक (वैकुण्ठ) को; यत् — जो; अप्राप्यम्
— दुर्लभ; हि — वस्तुतः; योगिभिः — योगियों के लिए भी।
भावार्थ — उस पर भगवान विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें
संशय नहीं; और वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है जो योगियों को भी दुर्लभ है।
व्याख्या — सेवा का फल यहाँ दो स्तरों पर कहा गया
है। पहला, अंतःकरण का स्तर—भगवान का प्रसन्न होना, जो स्वयं चित्त की शुद्धि है। दूसरा,
गति का स्तर—वैष्णव लोक की प्राप्ति। 'यदप्राप्यं हि योगिभिः' पद अत्यंत महत्वपूर्ण
है: जो गति कठोर योग-साधना, ध्यान और संयम से भी मुश्किल से मिलती है, वह माता-पिता
की निष्काम सेवा से सुलभ हो जाती है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि योग व्यर्थ है, बल्कि
यह कि सेवा-रूप योग सबसे सरल और सबसे सीधा मार्ग है—वहाँ योगी को ईश्वर तक पहुँचने
के लिए मन को खींचना पड़ता है, यहाँ सेवक को ईश्वर स्वयं खींच लेते हैं।
श्लोक ५
पितरौ विकलौ दीनौ वृद्धावेतौ गुरू सुतः ।
महागदेन संप्राप्तौ परित्यजति पापधीः ॥५॥
शब्दार्थ — पितरौ — माता-पिता; विकलौ — अशक्त, विकलांग;
दीनौ — दीन, दुःखी; वृद्धौ — वृद्ध; एतौ — ये दोनों; गुरू — गुरु के समान; सुतः — पुत्र;
महागदेन — महारोग से; संप्राप्तौ — ग्रस्त हुए; परित्यजति — त्याग देता है; पापधीः
— पापबुद्धि वाला।
भावार्थ — जो पापबुद्धि पुत्र इन महारोग से ग्रस्त,
विकल, दीन और वृद्ध माता-पिता को—जो गुरु के समान हैं—त्याग देता है, (उसका फल सुनो)।
व्याख्या — अब अध्याय का दूसरा पक्ष आरंभ होता है—त्याग
और उपेक्षा का पक्ष, जो प्रायश्चित्त-वर्णन के रूप में चलता है। 'गुरू' शब्द यहाँ निर्णायक
है: माता-पिता केवल कर्तव्य के पात्र नहीं, गुरु-स्थानीय हैं; अतः उन्हें छोड़ना केवल
पुत्र-धर्म का भंग नहीं, गुरु-द्रोह भी है। 'महागदेन संप्राप्तौ' अर्थात् जब वे महारोग
से ऐसे घिरे हों कि सहारे के अतिरिक्त कुछ न बचा हो—ठीक उसी समय उन्हें छोड़ देना।
'पापधीः' कहकर कवि बता देता है कि ऐसा निर्णय बुद्धि का नहीं, बुद्धि के भ्रष्ट होने
का फल है।
श्लोक ६
पुत्रो नरकमाप्नोति दारुणं कृमिसंकुलम् ।
वृद्धाभ्यां च समाहूतो गुरूभ्यामिह सांप्रतम् ॥६॥
शब्दार्थ — पुत्रः — वह पुत्र; नरकम् आप्नोति — नरक
में पड़ता है; दारुणम् — भयानक; कृमिसंकुलम् — कीड़ों से भरा हुआ; वृद्धाभ्याम् — वृद्ध
माता-पिता के द्वारा; च — और; समाहूतः — पुकारा गया; गुरूभ्याम् — गुरुजनों के द्वारा;
इह सांप्रतम् — यहाँ इस लोक में, अभी भी।
भावार्थ — वह पुत्र कीड़ों से भरे भयानक नरक में
गिरता है, क्योंकि यहाँ इस लोक में वृद्ध माता-पिता—गुरुजन—उसे पुकारते हैं (और वह
नहीं आता)।
व्याख्या — नरक का वर्णन 'कृमिसंकुल' शब्द से होता
है—कीड़ों से भरा, जहाँ कोई सहारा नहीं और कोई सुनने वाला नहीं। कवि का कौशल यह है
कि वह पहले ऐहिक दृश्य रखता है: वृद्ध माता-पिता घर में पुकार रहे हैं—'बेटा, आ जा,
पानी दे दे'—और पुत्र अनसुना कर देता है। फिर वही पुकार परलोक में नरक की पुकार बन
जाती है, जहाँ कोई उत्तर नहीं मिलता। जिसने अपने घर में सुनने से इनकार किया, उसकी
पुकार वहाँ सुनी नहीं जाएगी—यही शास्त्र का समान-भोग न्याय है।
श्लोक ७
न प्रयाति सुतो भूत्वा तस्य पापं वदाम्यहम् ।
विष्ठाशी जायते मूढो ग्रामघ्रोणी न संशयः ॥७॥
शब्दार्थ — न प्रयाति — (पास) नहीं जाता; सुतः भूत्वा
— पुत्र होकर भी; तस्य — उसका; पापम् — पाप; वदामि अहम् — मैं कहता हूँ; विष्ठाशी
— विष्ठा (मल) खाने वाला; जायते — होता है; मूढः — मूर्ख; ग्रामघ्रोणी — गाँव में भटकने
वाला नीच योनि का प्राणी (सूकर आदि); न संशयः — संशय नहीं।
भावार्थ — पुत्र होकर भी वह (पुकारे जाने पर) पास
नहीं जाता—उसका पाप मैं कहता हूँ: वह मूर्ख विष्ठा खाने वाला और गाँव में भटकने वाला
प्राणी हो जाता है, इसमें संशय नहीं।
व्याख्या — 'सुतो भूत्वा'—पुत्र होकर भी पुत्र का
धर्म न निभाना, यही उसका मूल अपराध है। पाप का फल यहाँ योनि-परंपरा में बताया गया है:
जिसने अन्न-जल देने से इनकार किया, वही जीवन भर अपवित्र वस्तु खाने को विवश होगा; जिसने
घर में अपने ही लोगों की पुकार अनसुनी की, वह गाँव-गाँव भटकेगा। 'ग्रामघ्रोणी' पद कठिन
है; टीकाओं में इसका अर्थ गाँव में विचरने वाला नीच योनि का प्राणी—सूकर आदि—लिया जाता
है, और कहीं-कहीं 'ग्रामसूकर' के रूप में भी पढ़ा जाता है। दोनों पाठों में आशय एक
ही है: वह योनि जहाँ भोजन का कोई विवेक नहीं रह जाता।
श्लोक ८
यावज्जन्मसहस्रं तु पुनः श्वा चाभिजायते ।
पुत्रगेहेस्थितौ वृद्धौ माता च जनकस्तथा ॥८॥
शब्दार्थ — यावत् जन्मसहस्रम् — हज़ार जन्मों तक;
तु — तो; पुनः — फिर; श्वा — कुत्ता; च अभिजायते — हो जाता है; पुत्रगेहे स्थितौ —
पुत्र के घर में रहते हुए; वृद्धौ — वृद्ध; माता च जनकः तथा — माता और पिता।
भावार्थ — जो पुत्र के घर में रहते हुए भी वृद्ध
माता और पिता की उपेक्षा करता है, वह हज़ार जन्मों तक कुत्ता होता है।
व्याख्या — यहाँ स्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है—'पुत्रगेहेस्थितौ',
अर्थात् माता-पिता उसी घर में रहते हैं, एक ही आँगन में, एक ही रसोई से दूर। उपेक्षा
दूरी से नहीं, सामीप्य से होती है; जो साथ रहते हुए भी अनदेखा किया जाए, उसका दुःख
सबसे गहरा होता है। 'श्वा' (कुत्ता) की योनि यहाँ प्रतीक भी है—कुत्ता घर-घर भोजन के
लिए भटकता है और जो मिले, खा लेता है; जिसने अपने घर में माता-पिता को भोजन से वंचित
रखा, वही भिक्षान्न पर जीने को विवश होगा।
श्लोक ९
अभोजयित्वा तावन्नं स्वयमत्ति च यः सुतः ।
मूत्रं विष्ठां स भुंजीत यावज्जन्मसहस्रकम् ॥९॥
शब्दार्थ — अभोजयित्वा — भोजन न कराकर; तौ — उन दोनों
को; अन्नम् — भोजन; स्वयम् अत्ति — स्वयं खाता है; च — और; यः सुतः — जो पुत्र; मूत्रम्
विष्ठाम् — मूत्र और विष्ठा; सः भुञ्जीत — वह खाए; यावत् जन्मसहस्रकम् — हज़ार जन्मों
तक।
भावार्थ — जो पुत्र माता-पिता को भोजन कराए बिना
स्वयं भोजन कर लेता है, वह हज़ार जन्मों तक मूत्र और विष्ठा का भक्षण करता है।
व्याख्या — भोजन का उदाहरण सबसे मार्मिक है, क्योंकि
भोजन से वंचित करना सबसे सूक्ष्म और सबसे निर्दयी उपेक्षा है—इसमें मारना नहीं पड़ता,
केवल भूलना पड़ता है। शास्त्र का प्रतिविधान भी उतना ही कठोर है: जिसने अन्न रोका,
उसे अन्न के स्थान पर अपवित्र वस्तु मिलेगी। यह वर्णन भय उत्पन्न करने के लिए नहीं,
बल्कि चेतना जगाने के लिए है—कि रसोई में रोटी बाँटते समय पहला हिस्सा किसका है, यही
पुत्र-धर्म की कसौटी है।
श्लोक १०
कृष्णसर्पो भवेत्पापी यावज्जन्मशतद्वयम् ।
मातरंपितरं वृद्धमवज्ञाय प्रवर्त्तते ॥१०॥
शब्दार्थ — कृष्णसर्पः — काला सर्प; भवेत् — हो जाता
है; पापी — वह पापी; यावत् जन्मशतद्वयम् — दो सौ जन्मों तक; मातरम् पितरम् — माता-पिता
का; वृद्धम् — वृद्ध; अवज्ञाय — अपमान करके, तिरस्कार करके; प्रवर्तते — आचरण करता
है।
भावार्थ — जो वृद्ध माता-पिता का अपमान करके उनके
विपरीत आचरण करता है, वह पापी दो सौ जन्मों तक काला सर्प होता है।
व्याख्या — अभाव और अपमान—ये दो भिन्न अपराध हैं।
पिछले श्लोकों में भोजन न देना था, यहाँ अवज्ञा है: मुँह पर कठोर बोलना, सामने से हुक्म
चलाना, उनकी सलाह को तुच्छ कहना। 'कृष्णसर्प' का चयन सार्थक है—सर्प विषधर है, जिससे
सब भय खाते हैं; जिसने अपने ही जनक-जननी को भयभीत किया, वह स्वयं भय का कारण बनता है।
साथ ही सर्प को अपनी जाति, अपना घर नहीं पहचानता—बिल में अकेला रहता है; अपने माता-पिता
से मुँह मोड़ने वाले की गति भी वही होती है।
श्लोक ११
ग्राहोपि जायते दुष्टो जन्मकोटिशतैरपि ।
तावेतौ कुत्सते पुत्रः कटुकैर्वचनैरपि ॥११॥
शब्दार्थ — ग्राहः अपि — मगर (घड़ियाल) भी; जायते
— हो जाता है; दुष्टः — दुष्ट; जन्मकोटिशतैः अपि — करोड़ों जन्मों तक भी; तौ एतौ —
उन दोनों (माता-पिता) की; कुत्सते — निंदा करता है; पुत्रः — पुत्र; कटुकैः वचनैः अपि
— कटु वचनों से भी।
भावार्थ — जो पुत्र कटु वचनों से माता-पिता की निंदा
करता है, वह दुष्ट करोड़ों जन्मों तक मगर होता है।
व्याख्या — यहाँ अपराध वाणी का है—'कटुकैर्वचनैः'।
शस्त्र से मारना एक बार का आघात है, कटु वचन रोज़ का आघात है; और माता-पिता के लिए
तो वह सबसे असह्य है, क्योंकि वाणी वही है जिससे उन्होंने बचपन में उसे बुलाया था।
फल भी वाणी-वंचित योनि है—मगर जल में रहता है, डूबता नहीं, पकड़ता है, बोल नहीं सकता।
जिसने वाणी का दुरुपयोग किया, उसे वाणी-हीन जीवन मिलता है।
श्लोक १२
स च पापी भवेद्व्याघ्रः पश्चादृक्षः प्रजायते ।
मातरंपितरं पुत्रो यो न मन्येत दुष्टधीः ॥१२॥
शब्दार्थ — सः च पापी — वह पापी; भवेत् व्याघ्रः
— बाघ हो जाए; पश्चात् — उसके बाद; ऋक्षः — भालू; प्रजायते — जन्म लेता है; मातरम्
पितरम् — माता-पिता को; पुत्रः — पुत्र; यः न मन्येत — जो नहीं मानता, आदर नहीं करता;
दुष्टधीः — दुष्ट बुद्धि वाला।
भावार्थ — जो दुष्टबुद्धि पुत्र माता-पिता को नहीं
मानता, वह पापी पहले बाघ और उसके बाद भालू होता है।
व्याख्या — 'न मन्येत' का अर्थ केवल अवहेलना नहीं—उन्हें
'न गिनना', उनके अनुभव और वचन को महत्वहीन मानना। बाघ और भालू दोनों हिंस्र हैं, पर
भिन्न स्वभाव के: बाघ अकेला, अकस्मात् आक्रमण करने वाला; भालू भारी, क्रूर और कुछ भी
सहने में असमर्थ। क्रम का आशय यह है कि जो माता-पिता के प्रति क्रूर होता है, उसकी
क्रूरता जन्म-दर-जन्म बढ़ती जाती है, घटती नहीं। यह पंक्ति इस अध्याय के उपदेश का केंद्रीय
सूत्र भी है—'मन्येत', अर्थात् मानना; माता-पिता की पूजा का पहला चरण यही है कि उन्हें
माना जाए।
श्लोक १३
कुंभीपाके वसेत्तावद्यावद्युगसहस्रकम् ।
नास्ति मातृसमं तीर्थं पुत्राणां च पितुः समम् ॥१३॥
शब्दार्थ — कुम्भीपाके — कुम्भीपाक नरक में; वसेत्
— रहता है; तावत् — उतने समय तक; यावत् युगसहस्रकम् — जब तक हज़ार युग; न अस्ति — नहीं
है; मातृसमम् — माता के समान; तीर्थम् — तीर्थ; पुत्राणाम् — पुत्रों के लिए; च पितुः
समम् — और पिता के समान।
भावार्थ — (वह) हज़ार युगों तक कुम्भीपाक नरक में
रहता है। पुत्रों के लिए माता के समान और पिता के समान कोई तीर्थ नहीं है।
व्याख्या — कुम्भीपाक नरक उनके लिए कहा गया है जो
उपकारी और निराश्रित प्राणियों को छलते हैं; इसलिए उसे माता-पिता के अपराध पर लगाया
जाना अर्थपूर्ण है। 'युगसहस्र' की सीमा दिखाकर शास्त्र पाप का भार समझाता है, फिर तुरंत
मुड़कर सूत्र-वाक्य देता है: 'नास्ति मातृसमं तीर्थं...'—भय के बाद प्रेरणा। यही अध्याय
की मूल भावना है—माता-पिता वह तीर्थ हैं जो जीवित रहते ही उपलब्ध हैं और जिनकी यात्रा
घर से बाहर नहीं जाती।
श्लोक १४
तारणाय हितायैव इहैव च परत्र च ।
तस्मादहं महाप्राज्ञ पितृदेवं प्रपूजये ॥१४॥
शब्दार्थ — तारणाय — (संसार से) तारने के लिए; हिताय
एव — हित के लिए ही; इह एव — इस लोक में भी; च परत्र च — और परलोक में भी; तस्मात्
— इसलिए; अहम् — मैं; महाप्राज्ञ — हे महाप्राज्ञ!; पितृदेवम् — पिता-रूपी देवता का;
प्रपूजये — भलीभाँति पूजन करता हूँ।
भावार्थ — हे महाप्राज्ञ! (माता-पिता) इस लोक और
परलोक—दोनों में तारने और हित करने वाले हैं; इसलिए मैं पिता-रूपी देवता का भलीभाँति
पूजन करता हूँ।
व्याख्या — यहाँ 'पितृदेव' पद का प्रयोग हुआ है—पिता
देवता हैं, इस भाव से की जाने वाली पूजा। यह वही भाव है जो तैत्तिरीय शिक्षावल्ली में
'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव' के रूप में मिलता है: देवता मंदिर में नहीं,
संबंधों में देखे जाएँ। 'इहैव च परत्र च' पद से सुकर्मा कहते हैं कि माता-पिता की सेवा
दोनों लोकों का साथ-साथ प्रबंध करती है—इसलिए यह सबसे किफायती और सबसे सुरक्षित साधना
है।
श्लोक १५
मातृदेवं सर्वदेव योगयोगी तथाभवम् ।
मातृपितृप्रसादेन संजातं ज्ञानमुत्तमम् ॥१५॥
शब्दार्थ — मातृदेवम् — माता को देवता मानकर; सर्वदेव
— सब देवताओं (के रूप में); योगयोगी — योग-युक्त योगी; तथा अभवम् — वैसा हो गया; मातृपितृप्रसादेन
— माता-पिता की कृपा से; संजातम् — उत्पन्न हुआ; ज्ञानम् उत्तमम् — उत्तम ज्ञान।
भावार्थ — माता को देवता और उनमें सब देवताओं को
देखते हुए मैं योगयुक्त योगी हो गया; माता-पिता की कृपा से मुझे उत्तम ज्ञान प्राप्त
हुआ।
व्याख्या — 'मातृदेवं सर्वदेव'—माता को देवता मानना
और उन्हीं में सब देवताओं का दर्शन करना। यहाँ भक्ति और योग एक हो जाते हैं: जो माता-पिता
की सेवा में मन लगाता है, उसका मन स्वयं ही एकाग्र हो जाता है—यही योग है, और इसी एकाग्रता
से उत्तम ज्ञान उपजता है। ध्यान दें कि सुकर्मा ज्ञान का स्रोत ग्रंथ नहीं, 'प्रसाद'
बताते हैं—कृपा। पुस्तक पढ़कर ज्ञान मिलता है, पर वह ज्ञान जीवन को नहीं बदलता; माता-पिता
की कृपा से मिला ज्ञान चरित्र बन जाता है।
श्लोक १६
त्रिलोकीयं समस्ता तु संयाता मम वश्यताम् ।
अर्वाचीनगतिं जाने देवस्यास्य महात्मनः ॥१६॥
शब्दार्थ — त्रिलोकीयम् — तीनों लोकों का; समस्ता
— समस्त (समुदाय); तु — तो; संयाता — आ गया; मम वश्यताम् — मेरे वश में; अर्वाचीनगतिम्
— निकट की, अवर (सांसारिक) गति को; जाने — मैं जानता हूँ; देवस्य अस्य — इस देव (पिता)
की; महात्मनः — महात्मा की।
भावार्थ — समस्त त्रिलोकी मेरे वश में आ गई; और मैं
इस महात्मा देव (पिता) की अवर—अर्थात् सांसारिक—गति भी जानता हूँ।
व्याख्या — सुकर्मा यहाँ केवल उपदेश नहीं देते, अपने
अनुभव की साक्षी देते हैं: तीनों लोकों की सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हैं। 'अर्वाचीनगति'
अर्थात् निकट की, नीचे की ओर की गति—पिता-रूपी देव की वह शक्ति जो सांसारिक व्यवहार
में काम करती है। कहने का आशय यह है कि माता-पिता की कृपा से जो मिलता है, वह केवल
मोक्ष नहीं—लौकिक सफलता, प्रतिष्ठा और सामर्थ्य भी उसी से मिलते हैं। सिद्धि का अहंकार
नहीं, स्रोत का स्मरण—यही इन पंक्तियों का स्वर है।
श्लोक १७
वासुदेवस्य तस्यैव पराचीनां महामते ।
सर्वं ज्ञानं समुद्भूतं पितृमातृप्रसादतः ॥१७॥
शब्दार्थ — वासुदेवस्य — भगवान वासुदेव के; तस्य
एव — उन्हीं के; पराचीनाम् — परा, ऊर्ध्व, श्रेष्ठ गति को; महामते — हे महामते!; सर्वम्
ज्ञानम् — सारा ज्ञान; समुद्भूतम् — उत्पन्न हुआ; पितृमातृप्रसादतः — पिता और माता
की कृपा से।
भावार्थ — हे महामते! वासुदेव की उस परा—श्रेष्ठ—गति
का तथा सारे ज्ञान का उदय माता-पिता की कृपा से ही हुआ है।
व्याख्या — पिछले श्लोक के 'अर्वाचीन' (अवर) के साथ
यहाँ 'पराचीन' (परा) जोड़कर शास्त्र दोनों गतियों को एक सूत्र में बाँध देता है: सांसारिक
सामर्थ्य और आध्यात्मिक परा-गति—दोनों माता-पिता की कृपा से। यह अद्वैत दृष्टि है—सेवा
में कोई क्षेत्र 'लौकिक' या 'पारलौकिक' बचता ही नहीं। 'महामते' और पहले के 'महाप्राज्ञ'
जैसे संबोधन बताते हैं कि सुकर्मा जानते हैं कि श्रोता स्वयं विद्वान है; फिर भी उसे
यह सरल सत्य सुनाना पड़ रहा है, क्योंकि विद्या से यह सत्य कभी-कभी ढक जाता है।
श्लोक १८
को न पूजयते विद्वान्पितरं मातरं तथा ।
सांगोपांगैरधीतैस्तैः श्रुतिशास्त्रसमन्वितैः ॥१८॥
शब्दार्थ — कः — कौन; न पूजयते — नहीं पूजेगा; विद्वान्
— विद्वान; पितरम् — पिता का; मातरम् तथा — और माता का; सांगोपांगैः — अंग-उपांग सहित;
अधीतैः — पढ़े हुए; तैः श्रुतिशास्त्रसमन्वितैः — श्रुति और शास्त्रों से युक्त (विद्याओं
के द्वारा)।
भावार्थ — जिसने श्रुति-शास्त्रों को अंग-उपांग सहित
पढ़ लिया है, वह विद्वान कौन होगा जो माता-पिता की पूजा न करे?
व्याख्या — यहाँ विद्या को पूजा का हेतु बनाया गया
है—जितना ज्ञान, उतना ही आदर। 'सांगोपांग' अर्थात् वेदांग और उपांग सहित संपूर्ण अध्ययन,
जिसे पूरा करने में जीवन बीत जाता है; ऐसा विद्वान यदि माता-पिता का आदर न करे तो उसकी
सारी विद्या का प्रयोजन ही क्या रहा? प्रश्न-शैली में रखा गया यह वाक्य उपदेश से अधिक
प्रभावी है, क्योंकि उत्तर श्रोता को स्वयं देना पड़ता है। यही अध्याय के शिक्षण-कौशल
का उदाहरण है।
श्लोक १९
वेदैरपि च किं विप्रा पिता येन न पूजितः ।
माता न पूजिता येन तस्य वेदा निरर्थकाः ॥१९॥
शब्दार्थ — वेदैः अपि — वेदों से भी; च किम् — क्या
प्रयोजन; विप्राः — हे विप्रों!; पिता येन न पूजितः — जिसने पिता का पूजन नहीं किया;
माता न पूजिता येन — जिसने माता का पूजन नहीं किया; तस्य — उसके; वेदाः निरर्थकाः
— वेद निष्फल हैं।
भावार्थ — हे विप्रों! जिसने पिता का पूजन नहीं किया
और जिसने माता का पूजन नहीं किया, उसके लिए वेदों से भी क्या प्रयोजन? उसके वेद निरर्थक
हैं।
व्याख्या — यह श्लोक कठोर है और जानबूझकर कठोर है।
'निरर्थक' का अर्थ यह नहीं कि वेदों में दोष है; अर्थ यह है कि जिसके चरित्र में माता-पिता
के प्रति आदर नहीं, उसके पास वेद केवल शब्द बनकर रह जाते हैं—वे उसके जीवन का अर्थ
नहीं बन पाते। वेदों का प्रयोजन पुरुष को सन्मार्ग पर चलाना है, और सन्मार्ग का पहला
पाठ घर से आरंभ होता है; घर में ही असफल विद्वान् के लिए शास्त्र उधार की संपत्ति जैसे
हैं। 'विप्राः' संबोधन से यह बात विशेष रूप से ब्राह्मण-समाज को कही गई है, जो वेदाध्ययन
का अधिकारी है।
श्लोक २०
यज्ञैश्च तपसा विप्र किं दानैः किं च पूजनैः ।
प्रयाति तस्य वैफल्यं न माता येन पूजिता ॥२०॥
शब्दार्थ — यज्ञैः च — यज्ञों से भी; तपसा — तप से;
विप्र — हे विप्र!; किम् — क्या; दानैः — दानों से; किम् च पूजनैः — और पूजाओं से क्या;
प्रयाति — प्राप्त होता है; तस्य वैफल्यम् — उसका वैफल्य, निष्फलता; न माता येन पूजिता
— जिसने माता की पूजा नहीं की।
भावार्थ — हे विप्र! जिसने माता की पूजा नहीं की,
उसके यज्ञ, तप, दान और पूजन—सब निष्फल हो जाते हैं।
व्याख्या — यज्ञ, तप, दान और पूजन—धर्म के ये चारों
प्रमुख मार्ग यहाँ एक साथ गिनाए गए हैं, और सबको एक ही शर्त पर टिका दिया गया है। यह
श्लोक कर्मकांड की निंदा नहीं करता, बल्कि उसकी नींव दिखाता है: यज्ञ में जो आहुति
दी जाती है, वह कृतज्ञता की आहुति होनी चाहिए; जो मनुष्य अपने जन्मदाताओं के प्रति
कृतज्ञ नहीं, उसका यज्ञ भी स्वार्थ की गणना बन जाता है। 'वैफल्य' शब्द का अर्थ है—किया
हुआ भी न किया हुआ; यह वह स्थिति है जिसमें साधन पूरे हैं, पर फल शून्य है।
श्लोक २१
न पिता पूजितो येन जीवमानो गृहे स्थितः ।
एष पुत्रस्य वै धर्मस्तथा तीर्थं नरेष्विह ॥२१॥
शब्दार्थ — न पिता पूजितः — पिता का पूजन नहीं किया;
येन — जिसने; जीवमानः — जीवित रहते हुए; गृहे स्थितः — घर में रहते हुए; एषः — यह
(सेवा); पुत्रस्य वै — पुत्र का तो; धर्मः — धर्म; तथा तीर्थम् — वैसे ही तीर्थ; नरेषु
इह — यहाँ मनुष्यों में।
भावार्थ — घर में जीवित रहते हुए भी जिसने पिता का
पूजन नहीं किया—यही (उनकी सेवा) पुत्र का धर्म और यहाँ मनुष्यों का तीर्थ है।
व्याख्या — 'जीवमानो गृहे स्थितः' पद पर ठहरना चाहिए।
शास्त्र यहाँ मृत्यु के बाद किए जाने वाले श्राद्ध-पिंड की ओर नहीं, जीवित पिता की
ओर संकेत करता है—जो सामने बैठा है, जिसे पानी चाहिए, जिसकी दवा का समय हो गया है।
पितरों को तर्पण देना पुण्य है, पर जीवित पिता को अनदेखा करके मृत पितरों को तर्पण
देना विडंबना है। 'एष धर्मः, एष तीर्थम्'—दो शब्दों में अध्याय का सार: पुत्र का धर्म
भी यही है और मनुष्यमात्र का तीर्थ भी यही।
श्लोक २२
एष पुत्रस्य वै मोक्षस्तथा जन्मफलं शुभम् ।
एष पुत्रस्य वै यज्ञो दानमेव न संशयः ॥२२॥
शब्दार्थ — एषः — यह (माता-पिता की सेवा); पुत्रस्य
वै मोक्षः — पुत्र का मोक्ष; तथा जन्मफलम् शुभम् — और शुभ जन्मफल; एषः पुत्रस्य वै
यज्ञः — यही पुत्र का यज्ञ; दानम् एव — दान ही; न संशयः — इसमें संशय नहीं।
भावार्थ — यही माता-पिता की सेवा पुत्र का मोक्ष
है, यही शुभ जन्मफल है; यही उसका यज्ञ है और यही दान है—इसमें संशय नहीं।
व्याख्या — पिछले श्लोक का 'एष धर्मः, एष तीर्थम्'
यहाँ चार और नामों से दोहराया गया है: मोक्ष, जन्मफल, यज्ञ, दान। चारों शब्द मिलकर
कहते हैं कि पुत्र के जीवन का कोई ऐसा धार्मिक प्रयोजन नहीं जो माता-पिता की सेवा से
बाहर हो। जन्म लेना तभी सार्थक हुआ जब जन्म देने वालों का ऋण उतरा; और 'ऋण' उतारने
का सबसे सच्चा रूप यही है—जिसने दिया, उसे लौटाना। यह श्लोक अध्याय के पहले भाग का
समापन-सूत्र है।
श्लोक २३
पितरं पूजयेन्नित्यं भक्त्या भावेन तत्परः ।
तस्य जातं समस्तं तद्यदुक्तं पूर्वमेव हि ॥२३॥
शब्दार्थ — पितरम् — पिता का; पूजयेत् नित्यम् —
प्रतिदिन पूजन करे; भक्त्या — भक्ति से; भावेन — भाव से; तत्परः — तत्पर होकर; तस्य
— उसके; जातम् — प्राप्त हो गया; समस्तम् तत् — वह सब; यत् उक्तम् — जो कहा गया; पूर्वम्
एव हि — पहले से ही।
भावार्थ — पिता की भक्ति-भाव से, तत्पर होकर प्रतिदिन
पूजा करे; उसे वह सब प्राप्त हो जाता है जो पहले कहा गया है (तीर्थ, दान और यज्ञ का
फल)।
व्याख्या — यहाँ विधि दी गई है—'नित्यं', 'भक्त्या',
'भावेन', 'तत्परः'। चारों पद मिलकर सेवा को कर्मकांड से भक्ति में बदल देते हैं: नित्यता
से उसमें निरंतरता आती है, भक्ति से श्रद्धा, भाव से अंतःकरण की भागीदारी और तत्परता
से सेवा की तत्कालता। 'तस्य जातं समस्तम्'—जो पहले कहा गया, वह सब उसे प्राप्त हो जाता
है; अर्थात् सूची दोहराने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि पूरा अध्याय उसी एक कर्म का विस्तार
है।
श्लोक २४
दानस्यापि फलं तेन तीर्थस्यापि न संशयः ।
यज्ञस्यापि फलं प्राप्तं माता येनाप्युपासिता ॥२४॥
शब्दार्थ — दानस्य अपि फलम् — दान का फल भी; तेन
— उसके द्वारा (प्राप्त); तीर्थस्य अपि — तीर्थ का भी; न संशयः — संशय नहीं; यज्ञस्य
अपि फलम् — यज्ञ का फल भी; प्राप्तम् — प्राप्त हो गया; माता येन उपासिता — जिसने माता
की उपासना की।
भावार्थ — जिसने माता की उपासना की, उसने दान का
फल, तीर्थ का फल और यज्ञ का फल—तीनों प्राप्त कर लिए, इसमें संशय नहीं।
व्याख्या — ध्यान दें कि पिछला श्लोक पिता के बारे
में था और यह माता के बारे में है—शास्त्र दोनों को बराबर के अधिकारी मानता है, किसी
को छोटा-बड़ा नहीं। 'उपासिता' शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है: माता की सेवा यहाँ 'उपासना'
कही गई है, अर्थात् वह पूजा के समान है, केवल कर्तव्य के समान नहीं। दान, तीर्थ और
यज्ञ—तीनों की गिनती इसलिए की गई कि सामान्य मनुष्य इन्हीं को धर्म मानता है; शास्त्र
कहता है कि इनका फल घर में ही उपलब्ध है।
श्लोक २५
पिता येन सुभक्त्या च नित्यमेवाप्युपासितः ।
तस्य सर्वा सुसंसिद्धा यज्ञाद्याः पुण्यदाः क्रियाः ॥२५॥
शब्दार्थ — पिता येन — जिसने पिता की; सुभक्त्या
— अच्छी भक्ति से; नित्यम् एव — प्रतिदिन ही; उपासितः — उपासना की; तस्य — उसकी; सर्वाः
— सब; सुसंसिद्धाः — भलीभाँति सिद्ध; यज्ञाद्याः — यज्ञ आदि; पुण्यदाः — पुण्य देने
वाली; क्रियाः — क्रियाएँ।
भावार्थ — जिसने सच्ची भक्ति से प्रतिदिन पिता की
उपासना की, उसकी यज्ञ आदि सब पुण्यदायी क्रियाएँ भलीभाँति सिद्ध हो जाती हैं।
व्याख्या — यहाँ 'सुसंसिद्धाः' पद का अर्थ है—पूरी
तरह सफल, बिना किसी छूट के। पिछले श्लोक में माता की उपासना से फल मिलता था, यहाँ पिता
की उपासना से क्रियाएँ ही सिद्ध हो जाती हैं—अर्थात् आगे की सारी साधना स्वयं सफल होने
लगती है। यह सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण भेद है: सेवा केवल एक अलग पुण्य नहीं, वह शेष
सब पुण्यों की भूमि है—जैसे उपजाऊ मिट्टी के बिना बीज का सींचना व्यर्थ है।
श्लोक २६
एतदर्थं समाज्ञातं धर्मशास्त्रं श्रुतं मया ।
पितृभक्तिपरो नित्यं भवेत्पुत्रो हि पिप्पल ॥२६॥
शब्दार्थ — एतत् अर्थम् — इस अर्थ को, इस निष्कर्ष
को; समाज्ञातम् — भलीभाँति जाना गया; धर्मशास्त्रम् — धर्मशास्त्र; श्रुतम् — सुना
गया; मया — मैंने; पितृभक्तिपरः — पितृभक्ति में तत्पर; नित्यम् — सदा; भवेत् — हो;
पुत्रः हि — पुत्र तो; पिप्पल — हे पिप्पल!।
भावार्थ — हे पिप्पल! मैंने धर्मशास्त्र सुनकर यही
निष्कर्ष जाना कि पुत्र को सदा पितृभक्ति में तत्पर रहना चाहिए।
व्याख्या — यहाँ सुकर्मा अपने कथन का सार स्वयं देते
हैं और श्रोता को नाम से संबोधित करते हैं—'पिप्पल'। 'धर्मशास्त्रं श्रुतं मया' कहकर
वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह उनका स्वतंत्र मत नहीं, शास्त्र-श्रवण से निकला निष्कर्ष
है; अर्थात् उपदेश की प्रामाणिकता श्रुति पर टिकी है। 'पितृभक्तिपरः' में 'भक्ति' शब्द
का प्रयोग पुनः दोहराया गया है—सेवा का प्राण भाव है, क्रिया नहीं।
श्लोक २७
तुष्टे पितरि संप्राप्तं यदुराज्ञा पुरा सुखम् ।
रुष्टे पितरि च प्राप्तं महत्पापं पुरा शृणु ॥२७॥
शब्दार्थ — तुष्टे पितरि — पिता के प्रसन्न होने
पर; संप्राप्तम् — प्राप्त हुआ; यदुराज्ञा — यदु राजा (यदु) के द्वारा; पुरा — पहले,
प्राचीन काल में; सुखम् — सुख; रुष्टे पितरि — पिता के रुष्ट (नाराज़) होने पर; च प्राप्तम्
— और जो प्राप्त हुआ; महत् पापम् — महान पाप/दुःख; पुरा शृणु — पुरानी (कथा) सुनो।
भावार्थ — पिता के प्रसन्न होने पर यदु-राजा को पहले
जो सुख प्राप्त हुआ, और पिता के रुष्ट होने पर जो महान पाप-फल प्राप्त हुआ—वह पुरानी
कथा सुनो।
व्याख्या — अब उपदेश कथा में बदलता है। सूत्र यह
है—पिता की प्रसन्नता और अप्रसन्नता दोनों का फल तत्काल और निश्चित है; इसके प्रमाण
के लिए सुकर्मा यदु-राजा की कथा का सहारा लेते हैं, जो इसी पुराण में विस्तार से आती
है। पुराण-शैली में सिद्धांत पहले कहा जाता है और उदाहरण बाद में; श्रोता को केवल नियम
नहीं, घटना सुनाई जाती है, क्योंकि कथा स्मृति में बैठती है और नियम भूल जाता है।
'पुरा शृणु' कहकर वे श्रोता का ध्यान आगे की कथा पर केंद्रित करते हैं।
श्लोक २८
रुरुणा पौरवेणापि पित्रा शप्तेन भूतले ।
एवं ज्ञानं मया चाप्तं द्वावेतौ यदुपासितौ ॥२८॥
शब्दार्थ — रुरुणा — रुरु के द्वारा; पौरवेण — पुरुवंश
में उत्पन्न; अपि — भी; पित्रा शप्तेन — पिता के शाप से शापित होकर; भूतले — पृथ्वी
पर; एवम् ज्ञानम् — ऐसा ज्ञान; मया च आप्तम् — मैंने भी प्राप्त किया; द्वौ एतौ — ये
दोनों (माता-पिता); यत् उपासितौ — जो उपासित किए गए।
भावार्थ — पुरुवंशी रुरु को भी पिता के शाप से पृथ्वी
पर (भ्रमण करना पड़ा)—इसी प्रकार का ज्ञान मैंने भी प्राप्त किया, क्योंकि मैंने इन
दोनों (माता-पिता) की उपासना की।
व्याख्या — रुरु का उल्लेख पिता के शाप के प्रसंग
में है—अर्थात् पिता की अप्रसन्नता का परिणाम कितना दूर तक जाता है, यह दिखाने के लिए।
पुराण में रुरु की कथा इसी पुराण के अन्य प्रसंगों में विस्तार से आती है, जहाँ शाप
और उससे मुक्ति—दोनों का वर्णन है; यहाँ सुकर्मा उसे केवल उदाहरण के रूप में स्मरण
करते हैं। उत्तरार्ध में वे अपनी बात पर लौटते हैं: 'एवं ज्ञानं मया चाप्तम्'—यह ज्ञान
मुझे इन दोनों की उपासना से मिला। इस प्रकार शास्त्रीय प्रमाण (श्रुति) और अनुभव-प्रमाण
(स्वयं की साधना) दोनों एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।
श्लोक २९
एतयोश्च प्रसादेन प्राप्तं फलमनुत्तमम् ॥२९॥
शब्दार्थ — एतयोः — इन दोनों (माता-पिता) के; प्रसादेन
— प्रसाद, कृपा से; प्राप्तम् — प्राप्त हुआ; फलम् अनुत्तमम् — अनुपम, सर्वोत्तम फल।
भावार्थ — इन दोनों की कृपा से मुझे अनुपम फल प्राप्त
हुआ।
व्याख्या — अध्याय का समापन इस छोटी-सी पंक्ति से
होता है—कोई नया उपदेश नहीं, केवल कृतज्ञता की स्वीकृति। 'अनुत्तम' शब्द का अर्थ है—जिससे
बढ़कर कुछ न हो; अर्थात् जो फल मिला, वह सबसे ऊपर है, उससे आगे कुछ पाने को शेष नहीं।
पूरा अध्याय जहाँ 'सर्वतीर्थसमं स्नानम्' से आरंभ हुआ था, वहीं 'अनुत्तम फल' पर आकर
ठहर जाता है—घर के आँगन से निकला तीर्थ अंत में सब फलों का स्रोत सिद्ध होता है।
अध्याय-समापन
(पुष्पिका)
इति श्रीपद्मपुराणे
भूमिखण्डे वेनोपाख्याने
मातापितृतीर्थमाहात्म्ये
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥६३॥
शब्दार्थ — इति — इस प्रकार; श्रीपद्मपुराणे — श्री
पद्मपुराण में; भूमिखण्डे — भूमिखण्ड में; वेनोपाख्याने — वेन-उपाख्यान में; मातापितृतीर्थमाहात्म्ये
— माता-पिता के तीर्थ की महिमा के प्रसंग में; त्रिषष्टितमः अध्यायः — तिरसठवाँ अध्याय;
६३ — उसका क्रमांक।
भावार्थ — इस प्रकार श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड
में, वेन-उपाख्यान के अंतर्गत, माता-पिता के तीर्थ की महिमा बताने वाला तिरसठवाँ अध्याय
समाप्त होता है।
व्याख्या — यह पुष्पिका पाठ की प्रामाणिकता और स्थान
दोनों बताती है—ग्रंथ (पद्मपुराण), खण्ड (भूमिखण्ड), उपाख्यान (वेन) और प्रसंग (मातापितृतीर्थ-माहात्म्य)।
साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि अध्याय में जो कुछ कहा गया, वह 'तीर्थ-माहात्म्य' शीर्षक
के अंतर्गत आता है—अर्थात् माता-पिता की सेवा को शास्त्र ने रूपक रूप में नहीं, सचमुच
तीर्थ कहा है।
अध्याय का
समग्र सार
पूरे अध्याय का केंद्रीय सूत्र एक ही है: माता-पिता जीवित तीर्थ हैं। स्नान करते
उनके अंगों से गिरती जल-बूँद सब तीर्थों के स्नान के समान है; उनकी सेवा यज्ञ, दान,
तप और तीर्थ-यात्रा—सबका फल एक साथ देती है; और जिसे योगी दुर्लभ मानते हैं, वह वैष्णव
लोक भी इसी से सुलभ हो जाता है।
दूसरी ओर, अध्याय ने उपेक्षा का पक्ष भी बिना नरमी के रखा है—भोजन से वंचित करना,
अपमान करना, कटु वचन बोलना, उन्हें 'न मानना'—इन सबके लिए योनि-परिवर्तन और नरक का
वर्णन आता है। इस वर्णन का प्रयोजन भय नहीं, जागृति है; शास्त्र का न्याय समान-भोग
का है—जो जिससे वंचित करेगा, वह उसी से वंचित रहेगा।
व्यावहारिक दृष्टि से अध्याय तीन बातें कहता है। पहली, सेवा की असली कसौटी वृद्धावस्था,
रोग और असहायता है—स्वस्थ माता-पिता की सेवा सहज है, रोगी और विकल की सेवा ही पुण्य
है। दूसरी, सेवा का प्राण भाव है, क्रिया नहीं—'नित्यं', 'भक्त्या', 'भावेन', 'तत्परः'
ये चारों पद इसी ओर संकेत करते हैं। तीसरी, सेवा जीवित रहते ही होनी चाहिए—'जीवमानो
गृहे स्थितः' पद मरणोत्तर कर्मों की अपेक्षा जीवन-काल की सेवा को प्रमुख बनाता है।
अंत में सुकर्मा अपनी साक्षी देते हैं: तीनों लोकों की सिद्धि, उत्तम ज्ञान और
अनुपम फल—सब उन्हें इन्हीं दोनों की कृपा से मिला। इस प्रकार अध्याय उपदेश से आरंभ
होकर कृतज्ञता पर समाप्त होता है।
