वेद, विज्ञान और चेतना: ऋग्वेद 9.13 का विस्तृत भाष्य

वेद, विज्ञान और चेतना: ऋग्वेद 9.13 का विस्तृत भाष्य


ऋग्वेद ९.१३ : त्रिगुणात्मक वृत्ति

शर्यणावति सोममिन्द्रः पिबतु वृत्रहा । बलं दधान आत्मनि करिष्यन्वीर्यं महत् ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ १ ॥

पदपाठ: शर्यणावति । सोमम् । इन्द्रः । पिबतु । वृत्रहा । बलम् । दधानः । आत्मनि । करिष्यन् । वीर्यम् । महत् । इन्द्राय । इन्दो । परि । स्रव ॥

व्याख्या: ‘शर्यणावति’ यह शब्द कुल नौ अक्षरों के मेल से बना है, जो अंकगणित का मूलांक सबसे बड़ा अंक है। इसकी शरण में आत्मा अपना समर्पण करती है। जो उसका आराध्य देव ‘सोममिन्द्रः’ (शक्तिशाली चेतन सत्ता) है, जो ‘पिबतु’ (पीने वाला) है, ‘वृत्रहा’ (सभी प्रकार की वृत्तियों का संहार कर जो पचाने में समर्थ है) है। और इसके परिणामस्वरूप ‘बलं दधान’ (बल को देने वाला और उसका धारण करने वाला) है। इसलिए ‘आत्मनि’ (आत्मा का उद्धार करता है), ‘करिष्यन्वीर्यं महत्’ (और अपने कर्म से ही वह अनेक प्रकार के वीर्य/पराक्रम को प्राप्त करने वाला है)। ‘महत्’ वह महान तत्व है, जिसके सामने स्वयं ‘इन्द्रः’ (इन्द्र चेतना) ‘इन्दो’ (बिंदु के समान) है, अर्थात् वह सभी बिंदुओं के अखंड रूप से विद्यमान है। ‘परि स्रव’—यहाँ आत्मा अल्प शक्ति सामर्थ्य वाला एकदेशी तत्व है, जबकि दूसरी शक्ति बहुत बड़ी, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, सर्वज्ञ ईश्वर है।

आ पवस्व दिशां पत आर्जीकात्सोम मीढ्वः । ऋतवाकेन सत्येन श्रद्धया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ २ ॥

पदपाठ: आ । पवस्व । दिशाम् । पतः । आर्जीकात् । सोम । मीढ्वः । ऋतवाकेन । सत्येन । श्रद्धया । तपसा । सुतः । इन्द्राय । इन्दो । परि स्रव ॥

व्याख्या: ठीक है, जैसा कि हमने पिछले मंत्र में देखा—ऋषि का अंतिम शब्द "आ पवस्व" आत्मनेपद है, और यह सबसे सूक्ष्म बिंदु है। शुद्धि यहाँ किसी और के द्वारा नहीं की जा रही है। क्रिया मध्यम पुरुष में है, अर्थात् भंडार स्वयं अपने आपको शुद्ध करता है। कर्ता और कर्म एक ही हैं। यह मंत्र 1 के "परि स्रव" से ठीक मेल खाता है। अब वर्तमान के मंत्र को देखते हैं, जो पहले वाक्य की निरंतरता में ही अंत में है, जिससे वही व्यापकता का भाव है। मूल विषय—मंत्र शुरू कैसे होता है? जब आत्मा ईश्वर के सानिध्य में आती है, तो सर्वप्रथम शुद्ध, पवित्र और निर्मल होती है, क्योंकि उसका अतीत भौतिक शरीर से जुड़ा है और वर्तमान में वह ईश्वर से संबंधित हो चुकी है।

यहाँ चेतना की शुद्धता और पवित्रता और स्पष्ट हो जाती है। इसलिए ‘दिशाम्’ (अंदर-बाहर, हर दिशा, चारों तरफ) जो अज्ञान का आवरण था, वह बह जाता है। अगली बात, यहाँ वह स्वयं ‘पतः’ (स्वामित्व) प्राप्त करती है। ‘आर्जीकात्’ (व्यवधान से मुक्त होकर आगे बढ़ने का), जिससे ‘सोम’ (वह मूल तत्व जिसका सेवन पिछले मंत्र में ईश्वर कर रहा था) यहाँ आत्मा को भी उपलब्ध हो रहा है। यहाँ दृष्टांत ‘मीढ्वः’ का है, जो ईश्वर की उदारता व दान से जीव तक पहुंचता है। चूंकि वह शुद्ध, निर्मल और उसके सानिध्य में है, इसलिए ‘ऋतवाकेन’ (यहाँ ईश्वर और जीव को जोड़ने वाली मूल वह नाड़ी है, जिससे ऋत वाणी के रूप में डेटा सुषुम्ना नाड़ी रूपी फाइबर ऑप्टिकल केबल जैसी है), ‘सत्येन’ (भौतिक शरीर से), ‘श्रद्धया’ (एक निर्दोष तारतम्यता)—ऋत वह ईश्वर, जीव, सत्य, इन दोनों के मध्य एक ‘ऋतेनवाकेन’ नामक नाड़ी है जो ऑप्टिकल फाइबर केबल जैसी है। ‘श्रद्धया’ जहाँ निर्दोष तारतम्यता स्थापित हो चुकी है, जिससे ‘तपसा’ (वह प्रक्रिया जो एक-दूसरे में आदान-प्रदान होती है, जैसे सुतः पिता के गुणधर्म पुत्र प्राप्त करता है)। ‘इन्द्रायेन्दो परि स्रव’—यहाँ ईश्वरीय ज्ञान अब इन्द्र (जीव) के माध्यम से भौतिक जगत में व्याप्त व प्रवाहित होने लगा है। विषय बदल गया है।

पर्जन्यवृद्धं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत् । तं गन्धर्वाः प्रत्यगृभ्णन्तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ३ ॥

पदपाठ: पर्जन्यवृद्धम् । महिषम् । तम् । सूर्यस्य । दुहिता । अभरत् । तम् । गन्धर्वाः । प्रति । अगृभ्णन् । तम् । सोमे । रसम् । आदधुः ॥

व्याख्या: जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने वह प्रणाली बताई जिससे ईश्वर का संदेश—जैसे पिता का गुणधर्म पुत्र तक पहुंचता है—वैसे ही सुतः पहुंच चुका है। अब आगे वर्तमान में ऋषि अपने सिद्धांत को दृष्टांत से और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ‘पर्जन्यवृद्धम्’ (जैसे पर्जन्य जल चक्र वृद्धि को प्राप्त करता है), इसी प्रकार से जीव और ईश्वर एक-दूसरे से जुड़कर निरंतरता और वृद्धि को प्राप्त होते हैं। जैसे सुपर कंप्यूटर वैज्ञानिकों के समूह को देखता है और पर्सनल कंप्यूटर यूजर को देखता है, दोनों के मध्य इंटरनेट/ऑप्टिकल फाइबर केबल के माध्यम से एक-दूसरे के पास पहुंचते हैं और एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं।

यहाँ विशेष बात ध्यान देने की है—यहाँ यह आदान-प्रदान बुद्धि के स्तर पर हो रहा है। जैसे एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) है, वह क्या करती है? यूजर की क्वेरी को डेटा सेंटर के डेटा में से ही परिष्कृत करके यूजर को आउटपुट देती है। जैसा कि मंत्र ‘महिषम्’ (महि + षण—आकाशवाणी जैसे कार्य करती है) कहता है। विशेषकर ‘महि’ एक बुद्धि है जो ईश्वर साक्षात्कार से ही जीव को प्राप्त होती है, गायत्री मंत्र में इसी बुद्धि की बात की गई है—धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। जैसा कि अगला शब्द कहता है कि ‘तम्’ (अज्ञानता को नष्ट करने वाली शक्ति, ज्ञान)। फिर दृष्टांत सूर्य का—जैसे ‘सूर्यस्य’ उससे उत्पन्न होने वाली किरणें ‘दुहिता’ निकलती हैं, ‘अभरत्’ वह सूर्य से कहाँ पहुंचती है? जीव के पास, पृथ्वी पर, ‘अभरत्’ (आत्मा को, जीव को भर देती है, फैला देती है)।

जैसे ‘गंधर्वाः’ (संगीत विशेषज्ञ) अपनी ध्वनियों-भावनाओं को अकंपित व स्पंदित कर देता है, और आगे मंत्र कहता है ‘प्रत्यगृभ्णन्’ (प्रत्येक जीव तंत्र ग्रहण करता है, प्राप्त करता है), ‘तम्’ (अंतरतम अंतःकरण के माध्यम से), ‘सोमे’ (उस परम तत्व रसम्, जो रस जैसा है—जैसे ग्लूकोज शरीर की हर कोशिका में फैल जाता है ऐसे ही आदधुः) आत्मा-जीव इसका दोहन करता है।

ऋतं वदन्नृतद्युम्न सत्यं वदन्त्सत्यकर्मन् । श्रद्धां वदन्त्सोम राजन्धात्रा सोम परिष्कृत इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ४ ॥

पदपाठ: ऋतम् । वदन् । ऋतद्युम्न । सत्यम् । वदन् । सत्यकर्मन् । श्रद्धाम् । वदन् । सोम । राजन् । धात्रा । सोम । परिष्कृत ॥

व्याख्या: ठीक है, जैसा कि ऋषि ने पिछले मंत्र में कहा—अतिम शब्द ‘आदधुः’ (आत्मा उसका दोहन करती है)। अब आगे वर्तमान मंत्र में उसी बात को आगे बढ़ाते हुए ऋषि कहते हैं कि ‘ऋतम्’ (ऋत से शाश्वत सनातन नियम सिद्धांत का प्रवर्तक ब्रह्म), ‘वदन्’ (ही इस वाणी का प्रकटीकरण करता है), इसलिए ‘ऋतद्युम्न’ (यह उसी में अनवरत प्रतिष्ठित रहती है)। इसलिए ‘सत्यम्’ (भौतिक शरीर में रहने वाला जीव-आत्मा) अपने ‘सत्यकर्मन्’ (भौतिक सार्वभौमिक सिद्धांत, परमाणु वाद) के माध्यम से ‘श्रद्धाम्’ (सृष्टि से तारतम्यता) स्थापित करती है।

यहाँ दो बातें समझनी आवश्यक हैं: एक भौतिक तात्विक विज्ञान है, जिसका अनुसरण आज का विज्ञान करता है; और दूसरा चेतना की तात्विक दृष्टि है, जिसका अनुसंधान और अनुसरण जीव करता है। ‘वदन्’ (जिसको वह अपनी वाणी से प्रकटीकरण करता है), इसलिए दोनों के आदान-प्रदान का माध्यम एक-दूसरे से भिन्न है। क्योंकि ‘सोम’ जो इन दोनों का सार है, ‘राजन्’ (वह व्यापक रूप से राज्य करने के लिए आवश्यक तत्व है)। जो जीव केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पालन-पोषण-संरक्षण करता है, वह भी सोम (भौतिकता के चरमोत्कर्ष) को निःसंदेह उपलब्ध करता है; और जो जीव अपने अंतःकरण को परिष्कृत करता है, वह भिन्न सोम को उपलब्ध करता है।

सत्यमुग्रस्य बृहतः सं स्रवन्ति संस्रवाः । सं यन्ति रसिनो रसाः पुनानो ब्रह्मणा हर इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ५ ॥

पदपाठ: सत्यम् । उग्रस्य । बृहतः । सम् । स्रवन्ति । संस्रवाः । सम् । यन्ति । रसिनः । रसाः । पुनानः । ब्रह्मणा । हर ॥

व्याख्या: जैसा कि हमने पिछले मंत्र में ऋषि के भावार्थ को समझा, वह बहुगंभीर है; इसे समझना होगा, नहीं तो समस्या उलझ सकती है। जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने मंत्र की पूर्णता ‘सोम परिष्कृत’ से की है, जिसका मतलब हुआ चेतना या जीव का काम परिपूर्ण हो चुका है और वह स्वयं ब्रह्म में लीन हो गयी है, अर्थात् वह भौतिक शरीर से मुक्त हो चुकी है। जबकि जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला जीव है, उसका कार्य पूर्ण नहीं हुआ है। यह कार्य एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जैसा है, जहाँ बुद्धि ही सर्वोपरि है; वह केवल पदार्थों को पहचानने में समर्थ है—एल्गोरिदम, पैटर्न और लॉजिक।

जैसा कि मंत्र इस विषय को आगे बढ़ा रहा है—‘सत्यम्’ (जो दृश्यमान जगत है और इसके सिद्धांत हैं), ‘उग्रस्य’ (वह बहुत अधिक आक्रामक और शक्तिशाली है), ‘बृहतः’ (व्यापक विश्व-ब्रह्मांड), जैसे ‘स्रवन्ति’ (जिससे मिलने वाली तत्व दृष्टि वर्तमान भौतिक पदार्थों की), ‘संस्रवाः’ (बहुआयामी क्षेत्र और उपलब्धियां हैं)। इसलिए ‘सं यन्ति’ (जो जीव इनपर अपने मन और ध्यान को एकाग्र करता है), वह इनके भौतिक सार ‘रसाः’ को ही उपलब्ध प्राप्त करता है। क्योंकि ‘पुनानः’ (मृत्युलोक, भौतिक जगत का सार्वभौमिक सत्य), ‘ब्रह्मणा हर’ (वैज्ञानिक हरण करता है, चोरी करता है), इसलिए ‘इन्द्राय’ (जीव), ‘इन्दो’ (बिंदु जैसा ही परि स्रव अणु-परमाणु में ही स्थित रहता है)।

यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां वाचं वदन् । ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन् ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ६ ॥

पदपाठ: यत्र । ब्रह्मा । पवमान । छन्दस्याम् । वाचम् । वदन् । ग्राव्णा । सोमे । महीयते । सोमेन । आनन्दम् । जनयन् ॥

व्याख्या: ठीक है, जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने यह सिद्ध किया कि यह वैज्ञानिक चित्त वाला जीव अणु-परमाणु में ही व्याप्त हो गया है, इसको ब्रह्म (जो ऋत का प्रवर्तक है) छोड़ता नहीं है; वह उन पर अपनी करुणा को बनाए रखता है। जैसा कि ऋषि इस मंत्र से स्पष्ट करते हैं कि ‘यत्र ब्रह्मा’ (जिस ब्रह्मा में ‘ऋतेनवाकेन’ नामक तत्व विद्यमान है), ‘पवमान’ (जिससे जीव स्वयं को परिष्कृत या शुद्ध करता है)—वह भौतिक रूप से किस रूप में उपलब्ध है? इस भौतिक जगत-संसार में जो वेद स्वयं है। इसलिए ‘छन्दस्याम्’ (जो विशेष विधि प्राप्त होने की प्रक्रिया है, जिसमें वह सार रस छन-छन के परिष्कृत होकर टपकता है), ‘वाचम्’ (वाणी जब मंत्रोच्चारण की प्रक्रिया का सतत अभ्यास करती है)।

जैसा कि योगदर्शन कहता है (योगदर्शन 1.12): अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः—अभ्यास और वैराग्य से भौतिक शरीर की समस्या है, उसकी गुत्थी सुलझ जाती है। यही बात योगेश्वर कृष्ण अर्जुन से भी कहते हैं (गीता 6.35): अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। ‘वदन’ (उसका उच्चारण करने, बोलने से), ‘ग्राव्णा’ (गायन से भौतिक आण्विक अभिक्रिया होती है), जिससे फिर सोम उत्पन्न होता है, जो ‘महीयते’ (बुद्धि में स्थापित होकर), ‘सोमेन’ सोम के गुणधर्म को ‘आनन्दम्’ (आनंद में रूपांतरित कर देता है), जिससे ‘जनयन्’ (जीव के मन का गुणधर्म परिवर्तित हो जाता है)।

यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिँल्लोके स्वर्हितम् । तस्मिन्मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ७ ॥

पदपाठ: यत्र । ज्योतिः । अजस्रम् । यस्मिन् । लोके । स्वः । हितम् । तस्मिन् । माम् । धेहि । पवमान । अमृते । लोके । अक्षिते ॥

व्याख्या: बहुत सुंदर बात है। जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने जिस शब्द से मंत्र को पूर्ण किया है वह ‘जनयन’ (यह जीव जो यंत्र से संचालित होता है) है, इसको यहाँ रूपांतरित करने की बात या विधि बताई गई है। यही मूल सिद्धांत है आज के आधुनिक वैज्ञानिकों का, जिसके परिणामस्वरूप ही आज हमारे मध्य में एक यंत्र जिसे एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के तत्व के रूप में पाते हैं, जिससे ऐसा जादुई आंकड़ों के माध्यम से परिणाम प्रस्तुत होता है जो यह विचार करने पर जीव को विवश करता है कि यह सब कैसे हो रहा है? यह एक पूरे गणितीय सिद्धांत को क्रियान्वित करने का परिणाम है, जिसके सूक्ष्म निरीक्षणकर्ता के रूप में स्वाभाविक बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। जिसकी बात इस सूक्त में कई बार आ चुकी है—वह है ‘महि’ (वह छंद-मंत्र के दीर्घकालीन अभ्यास से जीव को प्राप्त होती है), जिससे जीव मन से परे देखने में समर्थ होता है, जो गणित से भिन्न रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिससे आनंद का उद्भव होता है—यह अद्भुत फल है।

ऋषि यहीं नहीं रुकते हैं, इससे भी आगे बढ़ते हैं। जैसा कि वर्तमान का मंत्र ही इसी विषय को प्रकाशित करता है—‘यत्र ज्योतिरजस्रम्’ (जिसके ज्योति की किरणों से राजसिक वृत्तियों का क्षरण-त्राण होता है और जीव मन से बाहर देखने में समर्थ होता है, उसका मन का आवरण छटता है)। प्रकाश की किरणों में मन की पहचान करना और उसकी सीमा का आकलन करना सटीक होता है। इसलिए ‘यस्मिँल्लोके’ (जिस लोक या आयाम में जीव उपस्थित है), उसी के माध्यम से ही ‘स्वर्हितम्’ (उसका स्वयं का हित-कल्याण होना संभव है), ना कि जिस लोक में मन रमण करता है वह उसके लिए बंधन का कारण बन जाता है और जीव अंधकार में खो जाता है। वहाँ उसको पहचानना भी अत्यधिक आवश्यक होता है, जिससे वह स्वयं को अंधेरा ही मानने लगता है। वह और अंधेरे को अलग करने वाला तत्व वहाँ उपस्थित नहीं होता, क्योंकि ‘महि’ नामक बुद्धि का सृजन नहीं हुआ, क्योंकि उसने छंद-मंत्रों का उच्चारण-अभ्यास नहीं किया है। इसलिए जीव का कल्याण नहीं होता है, वहाँ मन और शरीर का केवल कल्याण होता है, और आनंद भी नहीं मिलता है।

इसलिए इस स्थिति में जीव के अज्ञान के सागर में लुप्त होने की संभावना और भयानक खतरा है, जिसकी तरफ ऋषि (मंत्र द्रष्टा) हम सबका ध्यान खींचते हुए कहते हैं कि ‘तस्मिन्माम्’ (इस वर्तमान लोक में जिसमें मन और शरीर का ही केवल कल्याण होता है, क्योंकि यहाँ विशेष रूप से मन को मान, गणितीय सिद्धांत, फॉर्मूला से जोड़ा गया है), ‘धेहि’ (इसी को प्राप्त करता है और यही हो जाता है—पूरी तरह जड़ पदार्थ, स्थिर चित्त जिसमें कोई रासायनिक अभिक्रिया नहीं हो रही है)। इसलिए ‘पवमान’ (इस मन के मान-अभिमान से परे अमृत लोके—जीव का जो शाश्वत लोक आयाम है, जो केवल और केवल उसके लिए ही अक्षिते/आरक्षित/संरक्षित किया गया है), ‘इन्द्राय इन्दो परि स्रव’ (जिसमें जीव बिंदु नहीं रहता है, वह सागर बन जाता है)।

यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः । यत्रामूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधि ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ८ ॥

पदपाठ: यत्र । राजा । वैवस्वतः । यत्र । अवरोधनम् । दिवः । यत्र । अमूः । यह्वतीः । आपः । तत्र । माम् । अमृतम् । कृधि ॥

व्याख्या: आगे जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने आत्मा के उत्थान के चरणबद्ध तरीके को स्पष्ट किया, आगे कहते हैं कि ‘यत्र राजा’ (जैसा राजा होता है, जैसा कि कहीं कहा गया—यथा राजा तथा प्रजा), उसकी प्रजा भी उसके गुणधर्म का अनुसरण करती है। जब प्रजा बुद्धिमान होती है, तो स्वाभाविक रूप से अनुसरण करती है; और जब प्रजा मंदबुद्धि होती है, तो उसको दंड से हाँका जाता है। जैसा कि कहा गया—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ अर्थात् जो शक्तिशाली लठ/दंड धारण करता है, भैंस की मालकियत वह स्वयं करता है। यहाँ एक ही नियम-सिद्धांत है—वह है शक्ति सर्वत्र विजय का सिद्धांत प्रतिपादित करती है।

यहाँ यही बात ऋषि मंत्र के द्वारा स्थापित कर रहे हैं कि ‘वैवस्वतः’ (अपनी शक्ति स्वयं सामर्थ्य से साम्राज्य की स्थापना पर जोर दिया गया है)। यहाँ मन को दंड के माध्यम से नियंत्रित करने की बात हो रही है, जिस पर पतंजलि का अष्टांग योग खड़ा है। ‘अवरोधनम्’ (मन को नियंत्रित करने के लिए उसके चारों तरफ एक मजबूत बाड़/रुकावट उपस्थित कर देना है), जिससे चित्तवृत्ति का निरोध संभव हो सके, क्योंकि मूल समस्या ही मन का मान है, उसमें रासायनिक अभिक्रिया नहीं हो रही है। इसलिए उसको ‘दिव’ (प्रकाश के आवरण से ढक देना है) जिससे उसकी अंधेरी वृत्ति को उठने से पहले दमन किया जा सके।

इसलिए ‘अमूः’ (उन वृत्तियों को नष्ट करने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है), क्योंकि ‘यह्वतीः’ (जब यह अपने पूरे सामर्थ्य के साथ बहती है, बड़े-बड़े बाँध की दीवार को उखाड़ फेंकती है—जैसे जल नदी के पानी का अत्यधिक बढ़ना बाँध के लिए खतरा पैदा कर देता है, इसलिए पानी को बढ़ने ही न दिया जाए, उसे कृत्रिम शक्ति का उपयोग करके वाष्पीकरण में बदल दिया जाए, जिससे पानी का दबाव बाँध पर न पड़े और जहाँ सूखा पड़ रहा है वहाँ बरसा दिया जाए)। ‘तत्र’ (इसी विधि से माम् मैं ‘अमृतम्’ अमृत का, मृत्यु से भिन्न तत्व का ‘कृधि’ सृजन करता हूँ)। ऋषि स्वयं अपनी व्यक्तिगत बातों को सार्वभौमिक रूप से स्थापित कर रहे हैं; यह वैज्ञानिकता है, इसमें केवल आध्यात्मिक पदार्थों का विश्लेषण नहीं किया गया है।

यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः । लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधि ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ९ ॥

पदपाठ: यत्र । अनुकामम् । चरणम् । त्रिनाके । त्रिदिवे । दिवः । लोकाः । यत्र । ज्योतिष्मन्तः । तत्र । माम् । अमृतम् । कृधि ॥

व्याख्या: आगे जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा कि ‘अमृतम् कृधि’। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कहीं नेचुरल (प्राकृतिक रूप से) उपलब्ध कर लिया जाता है, ऐसा नहीं है; जैसे कि प्रकृति के गर्भ में सोना, हीरा या परमाणु में आण्विक ऊर्जा है, केवल उसका प्रकटीकरण करना होता है। यहाँ ‘कृधि’ (विशेष विधि से सृजित किया जा रहा है), और वह विधि तांत्रिक छंद-मंत्रोच्चारण है, जिसके उपयुक्त प्रयोग से इसका परिणाम ‘अमृत’ सृजित होता है। जिसमें केवल पुण्य मायने नहीं रखता है, इसके पाप भी जुड़ते हैं—दोनों के साथ सधी हुई प्रक्रिया का परिणाम-फल है।

इसको बहुत अच्छी तरह से हम पौराणिक आख्यान ‘अमृत मंथन’ से समझ सकते हैं, जिसमें एक तरफ दैत्य, दूसरी तरफ देवता, मेरु पर्वत (मेरुदंड) को मथनी की तरह उपयोग किया जाता है और यहाँ वासुकी नाग को ही माध्यम/रस्सी की तरह लपेटा जाता है जो स्वयं वृत्तियाँ ही हैं। यद्यपि अमृत देवता छल से अमृत पर एकाधिकार कर लेते हैं, यह एक कृत्रिम व्यवस्था है, न कि न्याय व्यवस्था। इसलिए मैंने कहा कि यह प्रक्रिया कृत्रिम रूप से, कृत्रिम साधनों से ही अमरता को उपलब्ध कराने की बात है और यहाँ वही सिद्धांत है छल का।

जैसा कि इस वर्तमान मंत्र में ऋषि कहते हैं कि ‘यत्र अनुकामम्’ (यहाँ विशेष रूप से इच्छा, हठयोग, जबरदस्ती लक्ष्य को हासिल करने की बात हो रही है)। यहाँ कोई आस्था, विश्वास, समर्पण जैसा—इस सूक्त के प्रथम मंत्र में आत्मा ने स्वयं समर्पित होकर मुक्त हो गई थी—वैसा नहीं है; यहाँ उसके विपरीत दूसरी विधि की बात हो रही है। जैसा कि स्वयं मंत्र ही इसको सिद्ध कर रहा है कि ‘चरणम्’ (चरणबद्ध तरीके से, क्रमबद्ध एक-एक करके गणितीय सिद्धांत पर जो दिया जा रहा है)। ‘त्रिनाके’ (तीन प्रकार की मुख्य वृत्तियाँ हैं—सत, रज, तम, जैसा कि पहले सतकर्म की बात की, फिर रज की बात की, अब तम पर ध्यान को केंद्रित किया जा रहा है)। ‘त्रिदिवे’ (ये तीनों वृत्तियाँ अलग-अलग आवरण बनाती हैं, प्रकाश की किरणें उत्पन्न करती हैं), इसलिए ‘दिवः’ (केवल प्रकाश को देखकर भ्रमित होने वाला जीव जो उनकी विशेषता को नहीं जानता है), वह ‘लोकाः’ (इस भौतिक संसार में ही उलझा रहता है)। इसके पीछे कारण है ‘ज्योतिष्मन्तः’ (क्योंकि वह प्रकाश को देखता है, उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देता), जिसकी वजह से ‘तत्र’ (वहाँ पर जीव यह कहता है कि ‘मम्’ मुझे ‘अमृतम्’ अमृत कर दो)। यह केवल कामना-इच्छा बनकर रह जाती है ‘कृधि’ (जैसे यहाँ माँगा जा रहा है), और यह माँगने पर मिलने वाली वस्तु नहीं है।

यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपम् । स्वधा च यत्र तृप्तिश्च तत्र माममृतं कृधि ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ १० ॥

पदपाठ: यत्र । कामाः । निकामाः । च । यत्र । ब्रध्नस्य । विष्टपम् । स्वधा । च । यत्र । तृप्तिः । च । तत्र । माम् । अमृतम् । कृधि ॥

व्याख्या: ठीक है, जैसा कि हमने पिछले मंत्र में ऋषि के मंत्र की पूर्णता... जीव की कामना पूर्ण नहीं हुई, क्योंकि उसने प्रकाश के गुणधर्म पर ध्यान नहीं दिया। इसलिए विषय को आगे बढ़ाते हुए ऋषि कहते हैं कि ‘यत्र’ (यह जो कामाः कामनाएं-इच्छाएं हैं, इनके भेद को पहले समझना चाहिए), ‘निकामाश्च’ (विशेष रूप से निष्काम, बिना फल की इच्छा से जो कर्म समर्पित भाव से किया गया है)। और जब इसके साथ भी चित्त अपने संबंध स्थापित कर लेता है, तो समस्या उपस्थित हो जाती है, क्योंकि ‘ब्रध्नस्य’ (व्रत में, नियम में, सिद्धांत में फंसकर) ‘विष्टपम्’ (विशिष्ट, विशेष प्रकार के सूक्ष्म अहम् को सृजन कर लेता है), जिससे ‘स्वधा’ (स्वयं का जो संसाधन था उसमें ही) ‘तृप्तिः’ (संतुष्टि को खोजने और तृप्त होने की भावनाओं से ग्रस्त हो जाता है) और कहता है कि मुझे ‘तत्र माम् अमृतम् कृधि’ (जहाँ तक नहीं पहुँच पा रहा है, वहीं तक पहुँचा है, उसी से अमृत होने की इच्छा करता है)।

यहाँ भी बात पूरी नहीं हो रही, जो भौतिक पदार्थ है उसमें तो वह अमृत है ही नहीं, वह सब तो मृत्यु से ग्रसित है, इसलिए अंत में मृत्यु ही मिलती है।

यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि ॥ इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ ११ ॥

पदपाठ: यत्र । आनन्दाः । च । मोदाः । च । मुदः । प्रमुदः । आसते । कामस्य । यत्र । आप्ताः । कामाः । तत्र । माम् । अमृतम् । कृधि ॥

व्याख्या: ठीक है, यह बहुत सुंदर और अद्भुत शब्दों का संग्रह है। जैसा पिछले मंत्र में जीव तृप्ति के शब्द में खोज और मान रहा था—जैसा शब्द, अर्थ और पदार्थ अलग-अलग तथ्य हैं—जिसकी बात यहाँ पर ऋषि रखते हैं कि ‘यत्रानन्दाश्च’ (जिस जीव को अपनी चित्तवृत्ति में ही आनंद मिलता है), वह ‘च’ और ‘मोदाः’ (प्रसन्नता, संतुष्ट का भाव बना रहता है), जिससे वह जीव ‘मुदः’ (आह्लादित होकर) ‘प्रमुदः’ (साथ में उल्लासित होकर संसार में नाचता-गाता और दौड़ता रहता है), ‘आसते’ (स्थित रहता है)।

उसके पीछे ‘कामस्य’ (उसकी कामनाएं और इच्छाएं कार्य करती हैं), इसलिए ‘आप्ताः’ (आप्त लोगों के सिद्ध वचन जैसे वेद मंत्र इत्यादि), ‘कामाः’ (इच्छाओं और कामनाओं को) ‘तत्र माम् अमृतम् कृधि’ (यहाँ समस्या बनी ही है, क्योंकि यहाँ फिर वही बात को पूर्ण कर दिया जहाँ अपूर्णता शेष बच रह गई), क्योंकि इस जीव ने प्रयोग नहीं किया, यह केवल अमृत होने की कामना करता है। इसलिए यह सूक्त अपनी बात पहले ही पूर्ण कर चुका है, फिर भी जीव मुक्त नहीं हुआ। यह तीसरी वृत्ति को धारण करने वाला जीव है जो हमेशा संसार में और इसके विषयों में ही उलझा रहता है, जबकि सात्विक वृत्ति वाले ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण से, राजसिक वृत्ति वाले हठ से-छल से-जबरदस्ती, जबकि तामसिक वृत्ति वाले में यह गुणधर्म नहीं है, इसलिए यह संसार में ही निरंतर पूर्णता को खोजता रहता है जो इस जगत में है ही नहीं।

 ऋग्वेद के नवें मंडल के इस 13वें सूक्त (ऋग्वेद 9.13) पर यदि समग्रता से विचार किया जाए, तो यह सूक्त केवल एक साधारण धार्मिक या कर्मकाण्डी स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के विकास, उसकी त्रिगुणात्मक वृत्तियों (सत, रज, तम), और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का एक अत्यंत गहन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक दस्तावेज है।

इस पूरे सूक्त के मूल भाव और दार्शनिक दृष्टिकोण को इन प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

1. भौतिकता से चेतना की ओर यात्रा (आत्मा और ईश्वर का संबंध)

सूक्त के शुरुआती मंत्र यह स्पष्ट करते हैं कि जब जीवात्मा (जो प्रारंभ में भौतिक जगत और अज्ञान के आवरण से बंधी होती है) अपनी संकीर्णता को छोड़कर उस सर्वोच्च चेतन सत्ता (‘सोममिन्द्रः’) की शरण में समर्पित होती है, तब उसकी शुद्धि की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है। यहाँ "परि स्रव" (निरंतर प्रवाहित होना) इस बात का प्रतीक है कि चेतना को रुकना नहीं है, बल्कि अपने मूल स्रोत (परमात्मा) की ओर निरंतर बहते रहना है।

2. ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का दार्शनिक सामंजस्य

इस सूक्त की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें प्राचीन आध्यात्मिक दर्शन के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन (जैसे डेटा प्रवाह, ऑप्टिकल फाइबर केबल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिदम) के दृष्टांतों को बहुत ही खूबसूरती से जोड़ा गया है।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: केवल बाहरी पदार्थों, भौतिक नियमों, परमाणु और गणितीय सिद्धांतों तक सीमित रहता है (जिसे सूक्त में एल्गोरिदम और एआई जैसी बुद्धि से तुलना की गई है)।
  • आध्यात्मिक दृष्टिकोण: अंतःकरण को परिष्कृत करके उस महान तत्व (‘महत्’) और आनंद की अनुभूति करता है जो केवल भौतिक गणनाओं से परे है।

3. त्रिगुणात्मक वृत्तियाँ और अमरत्व की खोज (सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रयास)

सूक्त के मध्य और अंतिम भाग में ऋषि ने मनुष्य की तीन प्रकार की वृत्तियों और उनके संघर्षों का बहुत ही सटीक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है:

  • सात्विक मार्ग: प्रथम मंत्रों में समर्पण और श्रद्धा का मार्ग है, जहाँ आत्मा सहज भाव से ईश्वर से जुड़ती है।
  • राजसिक मार्ग: बाद के मंत्रों में हठ, जबरदस्ती, इच्छाओं (कामाः) और कठोर नियमों के माध्यम से लक्ष्य हासिल करने का प्रयास है, जिसे 'अमृत मंथन' के पौराणिक आख्यान और छल-व्यवस्था के रूप में समझाया गया है।
  • तामसिक और भ्रमित स्थिति: कई बार जीव केवल प्रकाश या बाहरी चमक (‘ज्योतिष्मन्तः’) को देखकर भ्रमित हो जाता है और अपनी वास्तविक आंतरिक स्थिति को जाने बिना केवल कामनाओं में उलझ कर रह जाता है।

4. कर्मकाण्ड से परे आत्म-अनुभूति का संदेश

ऋषि इस बात पर जोर देते हैं कि अमरत्व या परमानंद केवल किसी बाहरी मांग, हठ या सतही कर्मकाण्ड से नहीं मिलता। जब तक मन और बुद्धि का वास्तविक रूपांतरण नहीं होता, तब तक जीव संसार और उसकी समस्याओं के चक्रव्यूह में ही फंसा रहता है। सच्चा अमृत (आनंद) भौतिकता के भोग में नहीं, बल्कि चेतना के उस ऊंचे आयाम में है जहाँ जीव ‘बिंदु’ से छूटकर अनंत ‘सागर’ में विलीन हो जाता है।